विभिन्न साधनायें

नवग्रह साधना

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मनुष्य को जीवन भर नवग्रहों के प्रभाव में रहना पडता है,सूर्य पिता और पुत्र के रूप में नाम के रूप में,चन्द्र माता और शरीर में पानी तथा जानपहिचान के लोगों के रूप में,मंगल भाइयों और शरीर में खून के रूप में,बुध बहिन बुआ बेटी और बातचीत के साथ शरीर में शिराओं और धमनियों के रूप में गुरु दिमाग और आदि शक्ति के रूप में विद्यमान रहता है,इसी प्रकार से शुक्र शनि और राहु केतु का प्रभाव भी शरीर और संसार में किसी न किसी स्थान और अवयव के साथ रहता है,ग्रह कभी अनुकूल होते है तो कभी प्रतिकूल भी हो जाते है,इनकी प्रतिकूलता को समाप्त करने और इनके राजी रहने के लिये रत्न धारण किये जाते है,और पूजा पाठ भी किया जाता है,लेकिन सबसे अधिक प्रभाव मन्त्र जाप से मिलता है,विधि इस प्रकार से है

मंत्र

जपाकुसुम संकाशं काश्यपेयं महत द्युतिम।
तमोअरि सर्व पापघ्नं प्रणतोस्मि दिवाकरम॥
दधि शंखं तुषाराभं क्षीरोदार्णव संभवम।
नमामि शशिनं सोमं शंभोर्मुकुट भूषणम॥
धरणीगर्भ संभूतं विद्युतिकांति समप्रभम।
कुमारं शक्ति हस्तं च मंगलं प्रणमाभ्यम॥
प्रियगं कलिका श्यामं रूपेणापतम बुधम।
सौम्यं सौम्यं गुणं पेतं तं बुधं प्रणमाभ्यम॥
देवानाम च ऋषीणां च गुरुं कांचन सन्निभम।
बुद्धिभूतं त्रिलोकेशं तं नमामि बृहस्पतिम॥
हिमकुन्द मृणालाभं दैत्यानां परम गुरुम।
सर्वशास्त्र प्रवक्तारं भार्गवं प्रणमाभ्यम॥
नीलांजन समाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम।
छायामार्तण्ड संभूतं तं नमामि शनैश्चरम॥
अर्धकाय महावीर्यं चन्द्रादित्य विमर्दनम।
सिंहिका गर्भ सम्भूतं तं राहुं प्रणमाभ्यम॥
पलांश पुष्प संकाशं तारका ग्रह मस्तकम।
रौद्रं रौद्रात्मकं घोरं तं केतुं प्रणमाम्यहम॥

सुबह नहा धोकर दैनिक क्रियाओं से निवृत्ति पाकर एकान्त में नवग्रह का यंत्र या चित्र किसी चौकी पर बैठाकर उसके दाहिने भाग में घी का और बायें भाग में तेल का दीपक जलाकर मानसिक रूप से सभी ग्रहों का आवाहन करने के बाद एक माला या अधिक जितनी भी होसकें नित्य जाप करना चाहिये,जाप के समय किसी प्रकार का विघ्न नही उपस्थित होना चाहिये,जैसे टेलीफ़ोन और अन्य किसी के जाप स्थान पर आने जाने और बच्चों के रोने आदि का स्वर नही सुनाई देना चाहिये,अन्यथा जाप में विघ्न उपस्थित होगा।

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गायत्री साधना

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गायत्री मंत्र वास्तव में मंत्र राज है,संसार की कोई भी समस्या नही है जो इस मंत्र जाप के द्वारा सुलझाई नही जा सके,परन्तु श्रद्धा संयम और नियम विधान के पालन की अनिवार्यता के कारण अधिकांश साधक इसका लाभ नही उठा पाते,क्योंकि उनमें उपरोक्त आधारों की द्रढता नही होती है,कोई भी देवता हो,वह श्रद्धा भाव से स्मरण किये जाने पर प्रसन्न होता है,बाह्याडम्बर से वह और भी दूर हो जाता है,अत: जो भी साधना करे,इष्टदेवता के प्रति पूर्ण निष्ठा आस्था और अमर्पण की भावना से ही करें,झख मारकर की गयी साधना व्यर्थ होती है,पूजन सामग्री हो या न हो,विनियोग मुद्रा न्यास आदि करे या न करे,परन्तु यह आवश्यक है कि साधना का स्थान पवित्र एकान्त निरापद और शान्तिपूर्ण हो तथा साधक जो भी मन्त्र स्तुति जप करे पूर्ण तन्मयता और इष्ट के प्रति पूर्ण विश्वास के साथ करे,इस प्रकार उसे फ़ल की अवश्य प्राप्ति होगी।
देवी गायत्री की पूजा के लिये उनका चित्र लायें,सरस्वती अथवा लक्षमी या दुर्गा के चित्र से भी उद्देश्य की पूर्ति हो सकती है,चित्र की पूजा करके प्रणाम के उपरान्त गायत्री मन्त्र का जाप करना चाहिये। यदि पूरी आस्था और संयम के साथ क्रोध असत्य काम मांसाहार आदि से सर्वथा दूर रहे,प्रतिदिन ग्यारह माला का जाप करे,तो कुछ ही समय पश्चात मन्त्र जाप का प्रभाव साक्षात दिखाई देने लगेगा।

गायत्री मंत्र

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ऊँ भूभुर्व: स्व: तत्सवितुवरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात ॥

जाप की समाप्ति पर नित्य देवी की प्रार्थना करना भी जरूरी है

देवी प्रार्थना

देवि प्रपन्नार्तिहरे प्रसीद प्रसीद मातर्जगतोऽखिलस्य।प्रसीद विश्वेश्वरि पाहि विश्वं त्वमीश्वरी देवि चराचरस्य॥

गायत्री के शोधित यंत्र के लिये लिखें,और आपको कब गायत्री का जाप उचित फ़ल देगा,इसके लिये आप अपनी जन्म तारीख को इस साइट पर भरकर मय ईमेल एडरेस के भेजें. http://www.astrobhadauria.com

संतानगोपाल साधना

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भगवान श्रीकृष्ण संसार के प्रत्येक काम सुख के प्रदान करता है,चार पुरुषार्थों धर्म के लिये गुरु,अर्थ के लिये लक्षमी और काम के लिये श्रीकृष्ण तथा मोक्ष के लिये भगवान श्री विष्णु की उपासना की जाती है। भगवान शिव की आरधना मानसिक स्थित और जीवन की शांति के लिये की जाती है,ब्रह्मा की आराधना जीवन को बैराग्यमय बनाने के लिये की जाती है,इन्द्र की उपासना सांसारिक सुख सुविधाओं के लिये की जाती है,शक्ति और विजय के लिये दुर्गा की उपासना मानी जाती है,कभी कभी सांसारिक कुकृत्य और पूर्व पापॊ की बजह से संन्तान सब कुछ ठीक होते हुये भी नही हो पाती है,और जब संतान नही प्राप्त होती है,तो पुरुष को लाख बुराइयां होते हुये भी कोई कुछ नही कहता है,लेकिन स्त्री का जीते जी मरण हो जाता है,कोई बांझ कह कर पुकारता है,कोई सुबह सुबह चेहरा नही देखता है,स्त्री को सभी कुछ होते हुये भी कुछ नही है का भान हमेशा दिमाग में रहता है,उसे भी लगता है कि कोई "मैया" या माता कह कर पुकारे उसकी गोद में बैठ कर उसे निहारे,और वह अपने वात्सल्य रूपी प्रेम को खर्च करे,जब कोई डाक्टरी या अन्य सहायता नही काम कर पाती है,तो भगवान की शरण में जाना ही उचित माना गया है,अधिकतर लोग किसी न किसी प्रकार की कमी से ग्रस्त होते है,और वह कमी अगर भगवान श्रीकृष्ण की आराधना से दूर हो जाती है,तो कोई हानि नही होती है,लेकिन जिस प्रकार से आपने अपनी माता से स्नेह लगाया था,और किसी भी बचपन के कष्ट के समय उसे ही पुकारा था उसी प्रकार का भाव भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा या चित्र या यंत्र के आगे नित्य लाया जाय,तो कोई भी काम की कमी नही रहेगी,इस मंत्र के द्वारा कितने ही प्रकार के दोषों से युक्त स्त्रियां पुत्रवान हुयी है,और कितने ही डाक्टर आश्चर्य चकित हो गये है,जिन्होने अपने जीवन में चमत्कार नही देखा हो,वे इस मंत्र का जाप एक बार मन लगाकर और श्रद्धा तथा विश्वास से करके तो देखें।

मंत्र

मन्त्र का जाप करने से पहले उसका विनियोग करना जरूरी होता है,विनियोग करने से जिस प्रकार से पानी को छान कर शुद्ध कर लिया जाता है,उसी प्रकार से विनियोग करने के बाद मंत्र को अशुद्ध जपने से बचा जा सकता है।

विनियोग

ऊँ अस्य गोपालमन्त्रस्य नारद ऋषि: अनुष्टुप छन्द: कृष्णो देवता मम पुत्र कामनार्थ जपे विनियोग:।

ध्यान

अच्युतं केशवं राम नारायणं,कृष्ण दामोदरं वासुदेवं हरे। श्रीधरं माधवं गोपिकाबल्लभं,जानकी नायकं रामचन्द्रम भजे॥

जाप मंत्र

ऊँ देवकी सुत गोविन्द: वासुदेव जगत्पते। देहि मे तनयं कृष्ण व्वामहं शरणं गत:॥

अथवा

ऊँ गोपालाय विदमहे गोपीजनबल्लभाय धीमहि तन्नो गोपाल: प्रचोदयात।

इन मन्त्रों में किसी एक को ग्यारह माला (एक सौ आठ की एक माला) का जाप करना चाहिये,अधिक होने पर और भी अच्छा है। जाप के बाद साष्टांग प्रणाम करना,प्रार्थना करना भी जरूरी है,प्रार्थना के लिये इस श्लोक का मानसिक मनन करना चाहिये।

"ऊँ करारविन्दे नपदारविन्दं,मुखार विन्दे विनवेश यन्तम।
जगद वटेतं प्रथकं स्यानं,बालं मुकुन्दम मनसाभिराम:॥"

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