दो मुखी रुद्राक्ष की महिमा

हमारा भारत वर्ष तंत्र प्रधान देश है। इस देश मे यंत्र मंत्र तंत्र को मान्यता केवल इसलिये दी गयी है,क्योंकि भौतिक तंत्र तो केवल समय पर ही सकारात्मक रूप से फ़लीभूत होते है जैसे कहीं आने जाने के लिये मोटर गाडी,लेकिन जो तंत्र आध्यात्मिक रूप से फ़लीभूत होते है उनकी महिमा को केवल समझने वाले ही समझते है। शरीर रूपी इस मशीन का संचालन भी यत्र मंत्र और तंत्र से ही चल रहा है। जैसे आंखो से देखकर अनुमान लगाने की क्षमता,और जो आंखों से देखा है उसे याद रखने और समय पर उसे पहिचानने की क्षमता का विकास पूर्व अनुभव के आधार पर ही सम्भव है। मुंह से कहने के बाद क्या कहा और उसका प्रभाव क्या हो सकता है यह दिमागी अनुभव पर ही आधारित है। अगर अनुभव नही है तो गाली देने के बाद शरीर की दुर्दशा तो होनी ही है,और पहले से अनुभव है कि गाली देने के बाद शरीर पर मार भी पड सकती है तो गाली दी ही क्यों जाती ? इसी प्रकार से कानो से सुनने के बाद जो पूर्व अनुभव नही है तो समझना बेकार ही माना जाता है,जैसे कोई केवल हिन्दी भाषा को जानता है और उसे अक्समात तमिलनाडु में जाना पड जाये तो वह क्या समझ सकता है,लेकिन जो पहिले से ही तमिल भाषा को जानता है उसे तमिल का ज्ञान अपने आप होने लगेगा,वह आराम से सभी बातों को समझ भी सकता है और सभी बातों को कह भी सकता है,लेकिन पूर्व के अनुभव और सीखे गये ज्ञान के बिना सम्भव नही है। उसी तरह से मुंह से जो वाक्य बोले जाते है,वे भी एक तरह से शरीर के तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करने वाले होते है। जैसे किसी बात को उद्वेग से कहने पर शरीर में तनाव हो जाता है,किसी बात को कहने के बाद अगर बात को नही माना जाये तो दिमाग मे नकारात्मक भाव और चिडचिडापन हो जाता है,बार बार किसी बात को पूंछने पर या बार बार उत्तर देने से भी कोई नही समझे तो भी दिमाग घूमने लगता है,आदि कारण देखे जाते है। शरीर के संचालन के लिये दिमाग की महत्वपूर्ण भूमिका होती है,मंत्रात्मक प्रभाव केवल बोलने से स्मरण करने से ही पैदा होता है। जैसे किसी मशीन को संभालने के लिये उसके प्रयोग की जानकारी और उसमें लगने वाले पार्ट तथा उसे खोलने के लिये विभिन्न आकार के रिंच पाने जरूरी होते है उसी प्रकार से शरीर को किसी प्रकार के प्रभाव से बचाने के लिये बोलने पर सोचने पर सूंघने पर देखने पर स्पर्श करने पर जो प्रभाव होते है वे ही शरीर की गति को बढाने और घटाने वाले होते है। शरीर के अन्दर उसी प्रकार के प्रभाव उत्पन्न होने लगते है जैसा हम सोचते है,करते है कहते है सुनते है और समझते है। दो मुखी रुद्राक्ष का मतलब होता है एक ऐसी वनस्पति जो शरीर को छूने से सूंघने से स्पर्श करने से अपना प्रभाव देती है,लेकिन उसकी कसौटी को मापने के लिये कोई विशेष मशीन नही होती है। आज कल प्रतिस्पर्धा के युग में अपने अपने माल को बेचने और सस्ते माल से अधिक मुनाफ़ा कमाने के चक्कर मे नकली माल को बेचने का जमाना आ गया है,लोग अपने अपने सामान को अधिक से अधिक फ़ायदा का बताकर बेच देते है और उसके बाद उसका प्रभाव सही या गलत क्या पडता है उससे उन्हे कोई लेना देना नही होता है।

दो मुखी रुद्राक्ष कहाँ पैदा होता है ?

twoface%20rudraksh.jpgरुद्राक्ष एक वनस्पति का बीज है,यह पहाडी इलाकों में जहां अधिक से अधिक घने जंगल होते है और पानी कम टिकता है वहां इसके पेड पैदा होते है,एक मुखी से लेकर तीस मुखी तक के बीज एक ही पेड पर लगते है,अधिकतर रुद्राक्ष पांच मुखी होते है लेकिन प्रकृति का करिश्मा भी होता है कि उसी पेड से एक मुखी और दो मुखी जैसे रुद्राक्ष भी पैदा हो जाते है,यह केवल किसी प्रकार की ग्रह युति से ही होता है। जैसे राहु काल में या ग्रहण के समय में पैदा किसी भी जीव का बच्चा गहनिया कहलाता है,या तो कई हाथ पैर बन जाते है या कई जीभ या मुंह या दांत बन जाते है,जीव प्रकृति पर निर्भर है और इसी लिये जीव इस प्रकार के जीवों को नही पाल पाता है,लेकिन वनस्पति के अन्दर इतनी प्रबल क्षमता होती है कि वह अपने बीज को पाल भी लेती है और करामाती भी बना देती है। दो मुखी रुद्राक्ष उसी पेड पर होता है जिस पेड में ग्रहण के समय में कोई फ़ूल पराग को निषेचित करता है,अथवा कई फ़ूल निषेचन की क्रिया को कर लेते है,उतने ही फ़ूलो के फ़ल गहनिया बन जाते है और कई मुखी रूप धारण कर लेते है,गौरी शंकर फ़ल भी इसी प्रकार का रुद्राक्ष है। यह फ़ल अधिकतर असम के घने जंगलों में पैदा होता है,नेपाल की पहाडियों में भी पैदा होता है,तथा ठंडी जलवायु वाले स्थानों में भी पैदा होता है,लेकिन कामाख्या पर्वत पर पैदा होने वाले रुद्राक्ष सर्वाधिक महत्वपूर्ण इसलिये भी माने जाते है क्यों कि वह शक्ति स्थल पर पैदा होते है और वे अपनी शक्ति से पूर्ण होते है जरा से जाप और पूजा पाठ से अपना पूरा प्रभाव शरीर और मन के साथ बुद्धि पर देना शुरु कर देते है।

दो मुखी रुद्राक्ष का रूप

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यह कई रूपों में प्राप्त होता है,कभी बेर के आकार के गोल रूप में मिलता है और कभी लम्बे फ़ल के आकार में मिलता है,बादाम के आकार का रुद्राक्ष बहुत ही शुभ माना जाता है,तथा सर्प के फ़न के आकार का फ़ल जल्दी प्रभाव देने वाला होता है। इस फ़ल को नकली और असली समझने के लिये लोग आजकल कई प्रयोग बताते है जैसे कि वह पानी में डूब जाता है तो असली है और पानी में नही डूबता तो है नकली है,लेकिन पानी में डूबने वाला बीज अधिकतर नकली बना होता है कारण लकडी को जोडने के काम आने वाले विरोजा को सांचों में ढाल कर असली रुद्राक्ष का रूप देने के लिये लोग अपने अपने अनुसार इसका रूप बना लेते है,विरोजा से बनने के कारण और लकडी का बुरादा महीन पीस कर बनाने के बाद सिन्दूर और अरण्ड का तेल लगाने के बाद विरोजा का बना हुआ नकली रुद्राक्ष जिसकी कीमत मात्र पचास पैसा होती होगी उसे लोग हजारों रुपये का बेच देते है। असली को पहिचानने का तरीका होता है कि इसे नाखून से खोंटने पर वह लकडी के रूप में दिखाई देता है,तथा असली रुद्राक्ष कितना ही पानी से रगडो वह किसी स्थान से अपने रूप को नही बदलता है,इस फ़ल को कच्चा तोडने पर यह हल्का होजाता है और पानी में तैरने लगता है तथा पका होने पर यह भारी हो जाता है,और पानी में डूब जाता है,लेकिन फ़ल एक जैसे ही देता है,यह एक वनस्पति है और अपने वनस्पति के प्रभाव को नही बदलता है,सौ दो सौ साल तक इसका कोई रूप परिवर्तन नही होता है,इसे माला में पहिनने के बाद यह अपने अनुसार तथा शरीर एक स्पर्श से लगातार काला होता जाता है। उपरोक्त चित्र में असली रुद्राक्ष का रूप देख सकते है।

दो मुखी रुद्राक्ष कैसे फ़ायदा करता है

रुद्र का मतलब भगवान शिव से लिया जाता है,और अक्ष का मतलब होता है धुरी,भगवान शिव जो योगी के रूप में समाधिस्थ है और उनकी तीसरी आंख माथे के बीच में है,जहाँ एक मुखी रुद्राक्ष अपने किसी न किसी प्रकार के दुष्प्रभाव देने के लिये माना जाता है जैसे संतान के लिये पहिनना है तो धन में दिक्कत देता है और धन के लिये पहिना है तो संतान के लिये दिक्कत देता है,आदि बातें मानी जाती है लेकिन दो मुखी के लिये कोई हानिकारक बात नही होती है। एक मुखी को सोता हुआ और दो मुखी को जागता हुआ रुद्राक्ष भी कहा जाता है,अन्तर्मन को ठीक करने वाला और सदैव पित्त को शांत रखने वाला तथा शरीर और मन के बैलेंस को बनाने वाला होता है.अक्सर लोग रुद्राक्ष को नम्बर ज्योतिष से जोड कर उसका फ़ल बताने लगते है,जैसे कि एक नम्बर को एक मुखी से और दो मुखी को दो नम्बर से तीन मुखी को तीन नम्बर से जोड कर देखते है लेकिन रुद्राक्ष का रूप नम्बर ज्योतिष से परे ही देखना ठीक होता है। अक्ष को धुरी का रूप दिया जाता है तो धुरी जिस पर कोई भी वस्तु बात दिमाग मनुष्य रीति रिवाज धर्म विज्ञान टिका है उसे नम्बर से जोडकर देखना व्यर्थ ही माना जा सकता है। दो मुखी रुद्राक्ष में भगवान शंकर की सौम्य और शांत मुद्रा को देखना चाहिये,दिमागी बैचेनी और राहु के दुष्प्रभाव को रोकने के लिये इस का प्रयोग किया जाता है,जिन लोगों को रात को नींद नही आती है,वे करने कुछ जाते है और करने कुछ लग जाते है,जिनका मन हमेशा किसी न किसी बात से अशान्त है,खूब लगता है कि फ़ायदा होगा लेकिन जैसे ही काम को किया जाता है नुकसान लगने लग जाता है उस समय किसी न किसी प्रकार से राहु का ही दुष्प्रभाव माना जाता है। साथ ही इस रुद्राक्ष का प्रयोग स्नोफ़ीलिया खांसी वाले रोग जुकाम और शरीर के अन्दर कैमिकल की मात्रा बढने से भी रोकने में कामयाब है।

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अधिकतर मनुष्य को चिन्ता अपने भौतिक जीवन के प्रति होती है,जैसे जन्म के बाद शरीर की फ़िर शिक्षा की उसके बाद काम धन्धे की फ़िर शादी विवाह की उसके बाद सन्तान और फ़िर जायदाद और अन्य कारणों को पूरा करने की मानी जाती है,सभी बातों के लिये मानसिक ताकत भी जरूरी होती है,अगर व्यक्ति की मानसिक ताकत सही है तो वह अपने मन चाहे काम को बुद्धि को लगाकर सही कर लेता है,और मानसिक ताकत को बल नही मिलता है तो मनुष्य अपनी कितनी ही शिक्षा और बुद्धि का प्रयोग करे लेकिन कार्य को पूरा नही कर पाता है। दो मुखी रुद्राक्ष को शोधित करने के बाद अगर चांदी के अन्दर पैक करवाने के बाद सही समय और सही रूप से धारण कर लिया जाये तो यह मन के अन्दर नकारात्मक भाव नही आने देता है। दो मुखी रुद्राक्ष को जब निगेटिव साइड से फ़ोटो के अन्दर देखा गया तो उसके अन्दर से रश्मियां जो अनौखी प्रतिभा से प्रकाशित थी देखीं गयी,लोगों का विश्वास बढता देख लोग आजकल इसी दो मुखी रुद्राक्ष के नकली बीजों को लेकर उन पर रेजिन या लकडी को जोडने वाला पाउडर लगाकर एक सांप का फ़न लगाकर लोगों से धन ऐंठने का काम करते है,लेकिन जब भी लोग इस प्रकार के रुद्राक्ष को देखें तो बेचने वाले से कहें कि इस रुद्राक्ष को पानी में डुबाकर देखेंगे,जैसे ही पानी के अन्दर ऐसा रुद्राक्ष डाला जाता है,उसका बनावटी सांप रेजिन से अलग होकर निकल जाता है। असली रुद्राक्ष की फ़ोटो में निगेटिव का प्रकार उपरोक्त चित्र में दिया गया है। रुद्राक्ष को धारण करते समय रुद्राक्ष की प्राण प्रतिष्ठा नही कर पाते है,प्राण प्रतिष्ठा का मतलब होता है किसी भी वस्तु के लिये मानसिक भावना में सकारात्मकता को पैदा करना। जब तक किसी वस्तु को सकारात्मक प्रभाव से पूर्ण नही किया जायेगा तब तक किसी भी वस्तु से फ़ायदा लेना तो दूर बेकार में वजन गले में डालकर घूमना ही माना जायेगा। असली रुद्राक्ष को प्राप्त करने के लिये आप हमसे सम्पर्क कर सकते है,लेकिन इसे तभी मंगाये जब आपकी धारणा इस पर विश्वास करने वाली हो और आप इस पर श्रद्धा कर सकते हों,बिना श्रद्धा के और चमत्कारी वस्तु मान कर या जादुई वस्तु मानकर कृपया इसे न मंगवाये,बेकार में आपके धन की और हमारी मेहनत की कोई कद्र नही हो तो कैसा रहेगा आपके लिये रुद्राक्ष का पहिनना।

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