Sense

संसार के अन्दर जीवन को ग्रहण करने वाले जीव को अपनी अपनी प्रकृति के अनुसार अनुमान लगाने की शक्ति होती है,जैसे सूंघना देखना चखना स्पर्श करना सुनना और अनुमान लगाना.सूंघना पृथ्वी तत्व से जाना जाता है,देखना अग्नि तत्व से माना जाता है,सुनना वायु तत्व के अन्दर आता है और चखना जल तत्व के आधीन है,तथा अनुमान लगाना आकाश तत्व के आधीन है.

अनुमान लगाना ही ज्योतिष विज्ञान की देन है

आज की परिस्थिति को देखकर कल का अनुमान लगाया जाता है,जैसे आज बारिस हुयी है तो कल का अनुमान बारिस होने से ही लगाया जाता है लेकिन हवा अधिक चल गयी तो अनुमान आज के देखने से कल का अनुमान लगाने की बात गलत हो जाती है बारिस नही होकर अच्छी धूप निकली और अनुमान गलत हो गया,लेकिन ज्योतिष से अनुमान लगाने की कला को शुक्र और चन्द्रमा की युति बारिस के लिये देखना पडेगा साथ ही सूर्य के साथ राहु का प्रभाव डिग्री के अनुसार समझना पडेगा,अगर राहु ने सूर्य को बराबर की डिग्री को ग्रहण दिया है तो ग्रहण के समय में अच्छी निकली हुयी धूप भी चली जायेगी और पूर्ण ग्रहण के समय में केवल छाया ही दिखाई देगी यह सटीक अनुमान राहु और सूर्य की युति से लगाया जाता है,कहाँ कहाँ धूप निकलेगी और कहाँ नही निकलेगी यह सूर्य और राहु की आपस की डिग्री को देखकर ही पता किया जा सकता है। इसी प्रकार से चन्द्रमा की कला के अनुसार भी देखा जाता है कि शुक्र का साथ किस डिग्री पर अधिक है और शुक्र के जलीय प्रभाव से चन्द्रमा कहां पर पानी की बौछार देगा। इसी के साथ अगर शुक्र के साथ मन्गल का प्रभाव सामने है तो पानी नही बरसेगा बल्कि नमी होकर वातावरण में गर्मी का प्रभाव ही होगा। इसी प्रकार से अगर गुरु का प्रभाव मंगल के साथ शुरु हो जाता है तो बारिस भी नही होगी और नमी भी नही रहेगी बल्कि हवा के चलने के बाद भी पसीना आता रहेगा। इसी प्रकार से जब किसी व्यक्ति की कुंडली को देखा जाता है तो भाव और ग्रह की प्रकृति को समझ कर बताया जाता है कि जातक को कब दुख मिलेंगे और कब सुख मिलेंगे,कभी कभी दुख के समय में अगर राहु शनि केतु का प्रभाव अक्समात ही मिल जाता है तो बजाय दुख के सुख भी मिल सकते है और सुख की बजाय दुख भी मिल सकते है। लेकिन किसी के लिये के दुख का समय कहा जाता है और गुरु का प्रभाव दुख के ग्रह के साथ हो गया तो दुखो से भी फ़ायदा होने की बात समझी जाती है आदि के लिये अनुमान लगाने की बात केवल ग्रहों के द्वारा कहने के कारण ही ज्योतिष को वेद का छठा अंग माना जाता है.

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