शक्ति क्या है?

सारा आस्तिक जगत यह स्वीकार करता है कि अवश्य किसी सार्वभौम अलक्ष्य सत्ता कोई महामहती शक्ति इस प्रपन्च में सब कार्यों को चला रही है। जिस समय हम घट घट आदि भेदों की उपेक्षा कर इस प्रपंच पर द्रिष्टि डालते है तो हमारे ह्रदय में इस जगत का एक भावापन्न अगाध अप्रमेय स्वरूप अंकित हो जाता है। जल कणों से ही जल बनता है,सहस्त्रश: एक भावापन्न जल कणों को ही जल कहा जाता है,और ऐसे ऐसे कोटिश: जल जब एकत्रित होते है तब हम उसे समुद्र कहते है। उस समय यह एकभावापन्न जलराशि मनुष्य के लिये अगाध अप्रमेय अचिन्त्य जैसी हो जाती है। यही तुलना जगत की है,अनन्त भेद का नाम जगत या प्रपंच है जिसका फ़िर टुकडा न हो सके,इस प्रकार के अनन्त टुकडों से और भेदों से यह सारा प्रपंच बना है। और तब यह अगाध अनन्त अप्रमेय और अचिन्त्य जैसा हो गया है। इतना दुर्बोध रहते भी हम यह तो देख ही रहे है कि प्रत्येक पल में इस अगाध अचिन्त्य विश्व का भी प्रत्येक लघु अवयव अपने एक रूप को छोड कर दूसरे विचित्र रूप को धारण करता रहता है। यह गति रोकने से रुकती नही है। कभी कभी तो यह हाल होता है कि विश्व की किसी छोटी से छोटी गति को भी रोकने वाला स्वयं उस गति के प्रवाह में बहने लगता है,इस विश्व की गति को कोई समझकर भी नही समझ पाता। कोई कोई सुनकर देखकर भी नही समझने पाते। यह सारा जगत किसी चतुष्पात यानी चारो तरफ़ समान निवास करने वाले महाशक्तिमान का एक चरण भाग है,"पादोऽस्य विश्वा भूतानि"। जिसके मान लिये हुये एक तुकडे का भी जब बडे बडे बुद्धिमान लोग जैसे शिव सनकादि पता नही पा सकते,तब फ़िर उस सर्वांशी सर्वेशान सर्वश्य वशी सच्चिदानन्द भगवान का पता अल्पाल्पज्ञ जीव कैसे पा सकता है। हमारी शक्ति भी उतने ही नाप तौल की होती है जितने हम होते है,इस उदाहरण से ही यदि काम लें तो कह सकते है कि उस विश्वातीत सर्वेश्वर भगवान की शक्ति भी वैसी है जैसा वह है। वह विश्वातीत है तो यह भी अप्रमेया है,वह सर्वेश्वर है तो यह भी सर्वेश्वरी है,वह सब को वश में कर लेने वाला है,तो यह भी विश्वमोहिनी है,यदि उनकी महिमा मन वचनों से अतीत है तो फ़िर भगवती की भी लीला अपरम्पार है। ऐसी दशा में हम उस अचिन्त्य शक्तिमान और उसकी शक्ति को,जो दोनो मिलकर इस अचिन्त्य जगत को चला रहे है,कैसे और किस रूप में दुनिया के आगे प्रकाशित करें। हमारी सामर्थ्य नही है,चलो छुट्टी मिली सोना चाहते ही थे बिछौना मिल गया। किन्तु यह हमारा कल्याण हमें चैन से बैठने नहीं देता। यह हमारे ह्रदय में बैठा बैठा ही साल में एक बार तो हमें उठा ही देता है,कहता है कब तक औंघते रहोगे,एक दिन तो चलना ही है,इस धर्मशाला में कितने दिन सो सकोगे,और कहीं ठिकाना नही हो तो फ़िर कल्याण के घर ही चलकर चलकर सो जाओ,वहाँ अगर जाकर सो गये तो फ़िर कोई जगाने वाला नही है। तो क्या जबरदस्ती कल्याण के घर चलना होता? अच्छी बात है,हम तो ऐसे पोस्ती है कि - "अनाहूता न यास्यामो गृहे मृत्योर्हररपि"। किन्तु मेरे मित्र कल्याण ! तुम्हारे घर का का तो हमें पता ही नही,कैसे पहुंचेंगे ? कया कहा ? यह लकडी थाम लो ? इसके सहारे फुंच जाओगे ! बहुत से अंधे आज भी अपना काम चला रहे हैं। अंधों की लकडी है। लकडी के द्वारा वे अपने घर का मार्ग तै कर लेते है। "सर्वस्य लोचनं शास्त्रम" - अज्ञानियों को अपना ध्येय प्राप्त करने के लिये नेत्र शास्त्र ही है। उस परात्पर भगवान की शक्ति का निरूपण करने के लिये शास्त्र ही नेत्र ज्योति है,हमे उसके लिये शास्त्र ही शरण हैं।

शक्ति का स्वरूप

भगवान की शक्ति भगवान से पृथक नही है। वह भी भगवान ही है,ये सच्चिदानन्द भगवान जिस समय (सृष्टि के पूर्व) तिरोहितधर्म सुप्त-शक्ति अतएव अन्त:क्रीड व्यापक रहते है उस समय उनकी यह शक्ति-महारानी भी उनके स्वरूप में मिली हुयी जागती हुयी भी सोती रहती है। एक और व्यापक रहती है,और जब वे भगवान जगत-रूप से अनन्त रूप धारण करते है तब यह शक्ति-महारानी भी अपने अनन्त रूप बना लेती हैं। भगवान ने जगत रूप अपनी क्रीडा के व्यवहारों को यथावस्थित चलाने के लिये विरुद्धाविरुद्ध अनेक रूप धारण किये है,तो शक्ति भी इसी प्रकार से विरुद्धाविरुद्ध विविध प्रकार से प्रकत हुयी। अतएव भगवान के अनन्त रूप है,तो उनकी शक्तियां भी अनन्त हैं। उनमें विरुद्ध शक्तियां भी सप्रयोजन है,जिस कार्य की अपेक्षा है उसको करने के लिये तदनुकूल शक्ति का भी निर्माण किया गया है। विरुद्ध शक्ति के प्रादुर्भाव से कार्य को अनुकूल कर लिया जाता है,जड को किंवा चेतन जब किसी पदार्थ की किसी दूसरे पदार्थ में अति आशक्ति होकर क्रीडा होने लगती है,और इस क्रीडा से दोष होने की सम्भावना होने लगती है,किंवा दोष उत्पन्न होते है तब भगवान उसी समय उससे विरुद्ध शक्ति को उत्पन्न कर उन आते हुये दोषों को दूर कर पदार्थों का समीकरण करते रहते हैं। इस तरह वे कर्मज कालज और स्वभावज दोषों का निवर्तन करते हैं। और मोहिनी माया से आते हुये दोषों को अपनी चिच्छाशक्ति से दूर करते हैं। देश दोष तो भगवान में आ ही नही सकता है। क्योंकि भगवान अपने आत्मा में ही सर्वदा निवास करते हैं। यह अक्षर ब्रह्मरूप भगवदात्मा सर्व धर्मों से अस्पृष्ट ही रहता है,इस तरह भगवान सर्वजगत रूप रहने पर भी उच्चावच सर्व प्रकार की लीलाओं को काते रहने पर भी अपने स्वरूप में- लीला में पांचों प्रकार के दोषों का सम्बन्ध न होने देने के लिये विविध अनन्त शक्तियों का आविर्भाव करते हैं। इन अनन्त शक्तियों में तीन शक्तियां प्रधान है। सर्वभवनसामर्थ्य,मोहिनी और क्रिया। ये प्रधान किंवा अप्रधान सब प्रकार की शक्तियां शास्त्रों माया शब्द से कही गयी है,अतएव कभी कभी विद्वानों को भी माया का अर्थ समझने में भूल हो जाती है। वास्तव में देखा जाय तो सर्वभवनसामर्थ्यरूप माया का ही सब खेल है,सारा जगत जड या चेतन सब का सब इस सर्वभनसामर्थरूप माया के द्वारा ही बनाया गया है। इसे एक मशीन की तरह से समझिये। सुनारों के पास जो एक ढालने का सांचा होता है,वे लोग सांचे का स्पर्श करके अनेक पदार्थ तैयार कर लेते हैं। सुवर्ण भी उस सांचे का स्पर्श पाकर अनेक रूपों में प्रकट हो जाता है। इसी प्रकार भगवान भी उस सर्वभवनसामर्थ्य (सबकुछ होने की ताकत) रूप अपनी माया शक्ति का स्पर्श कर जब प्रकट होता है तब उस भगवान को ही अल्पबुद्धि लोग जगत कहने लगते है। और कितने ही उसे भगवान से अलग समझते है। सबसे बडी यह शक्ति है। उत्कर्ष-अपकर्ष समता-विषमता भला-बुरा सत्य-असत्य जो कुछ दिखाई देता है,वह सब कुछ इसी माया महाशक्ति का ही सामर्थ्य है। माया के सहारे सृष्टि का निर्माण होना यह पौराणवर्णन है,श्रौत नही। श्रुति में तो माया के स्पर्श बिना ही भगवान अपने आप को जगत रूप में प्रकाशित करता है-"स आत्मानँस्वयमकुरुत",और श्रीमद्भागवतादि पुराणों में तो इस प्रकार वर्णन है- "स एवेदं ससर्जाग्रे भगवानात्ममायया। दसद्रूपया चासौ गुणमयागुणो विभु:"। सबसे पहले इस सर्वसमर्थ भगवान ने अपनी उच्च नीच स्वरूपा अतएव गुनम्यी मायाशक्ति से इस जगत को पैदा किया। भगवान निर्दोष और अप्राकृत अनन्त गुण वाले है,अतएव अपने स्पर्श से उसे गुणमयी और तत्तादृश आकृतिवाली बना देते है,भगवान के स्पर्श से ही वह बुनमयी हुयी और अब वह जगत की प्रक्रुति (अवानतरमूल) हुयी,अतएव उसमें आने के बाद वे गुण प्राकृत कहलाने लगे। स्पर्श परस्पर होता है,जैसे भगवान का स्वर्श माया को हुआ,इसी प्रकार माया का स्पर्श भगवान को भी हुआ ही। किन्तु भगवदगुण तो माया में आये,पर भगवान में माया के गुण नहीं आये। भगवान तो निर्गुण के निर्गुण ही रहे। इसीलिये मूल में ’विभु:’ पद दिया गया है। भगवान में वैसी सामर्थ्य है। कमलपत्रों में ही सामर्थ्य है कि वह जल का स्पर्श होने पर भी उससे निर्लेप रहे,लेकिन जल उसके गुण यानी सुगन्ध को ले जाये। इसी प्रकार भगवान भी उस अपनी माया शक्ति में प्रवेश करते हैं। अपने सच्चिदानन्दादि गुणों को माया में से होकर निकालते है,तथापि उसके धर्म भगवान का अभिभव नही कर सकते। यह भगवान का विभुत्व है।

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