शनि की साढेशाती

प्राणी जगत मे जीव का आना और जाना निश्चित है। जीव को पृथ्वी पर परिवर्तन करने के लिये भेजा जाता है। उसके कुछ कार्य पृथ्वी पर नियत होते है। उन कार्यों को करने के बाद उसे दूसरे कार्यों को करने के लिये अलग अलग रूप में भेजा जाता है। उन रूपों का अलग अलग तरह के जीवों में वर्गीकरण किया जाता है। सभी जीवों और वनस्पतियों सूक्ष्म और बृहद रूपों में जीव को जीव की सहायता के लिये भेजा जाता है। सभी जीवों की उत्पत्ति जल में थल में वायु में पैदा की जाती है,और सभी को एक दूसरे का नियम से सहायता करने के लिये एक दूसरे के कार्य बांट कर भेजा जाता है। सभी ग्रह अपनी अपनी शक्ति से जीव को पूरित करते है और उस शक्ति का प्रयोग जीव परिवर्तन में इस पृथ्वी पर करता है। मनुष्य के अन्दर केवल बुद्धि नामकी शक्ति प्रदान की जाती है,और उस बुद्धि से वह अपने अपने अनुसार कार्य पृथ्वी पर पूर्ण करता है और दुबारा से उसकी चाहत के अनुसार इस जगत में भेजा जाता है और उसने अगर कार्य पूर्ण कर लिये है तो उसे वापस आने जाने की क्रिया से मुक्त कर दिया जाता है। जिस प्रकार से सूर्य रोशनी देता है ऊष्मा देता है जीवन शक्ति देता है वैसे ही चन्द्रमा पानी और मन की सोच देता है,मंगल पराक्रम को देता है बुध बुद्धि और संचार की क्रिया और महसूस करने की शक्ति को देता है गुरु शिक्षा और सभी से आपसी सम्बन्ध स्थापित करने की क्रिया शक्ति को देता है,शुक्र परिवर्तन के समय में की जाने वाली सजावट की क्रिया शक्ति को देता है शनि कर्म करने का अधिकार और कर्म करने की शक्ति के साथ क्रिया के दौरान काम करने के बाद सीखने और किये जाने वाले कार्यों से थकने के बाद आराम करने के साधन देता है,राहु किये जाने वाले कार्यों में अचानक परिवर्तन करने की शक्ति देता है,केतु हर जीव के अन्दर सहायता के रूप में शरीर के अंगों सह्ति संसारिक प्राणियों के रूप में अपनी अपनी क्रिया से सहायता के लिये पैदा करता है। क्रियाओं को करने के बाद जीव के द्वारा जो गल्ती होती है और जो कार्य सुचारु रूप से नही किये जाते है या जिन कार्यों के दौरान कार्य नियम से नही किये जाते है,अथवा जीव अपनी बुद्धि के अनुसार जो कार्य जिस समय पर किया जाना था उस कार्य को उस समय पर नही करता है तो शनि उस जीव को अपने अपने समय में कार्य को दुबारा करने के लिये या कार्य को कठिन अवस्था में करने के लिये अपने समय को देता है। जो कर्म मनुष्य के द्वारा समय पर नही किया गया है,या समय पर उस कार्य की शिक्षा अपने ऐशो आराम के कारण नही ले पाया है तो शनि उस कार्य को करने के लिये प्रेक्टिकल रूप से कार्य को करने की शिक्षा देता है। अक्सर जीव कभी अपने अपने अनुसार कार्य नही करता है,अगर वह करता भी है तो उसे आराम करने की अधिक तलब होती है,आराम के साधनों के लिये वह तरह तरह के प्रयोग करता है और कार्य को पूरा करने के लिये वह नियत समय का उपयोग नही करता है,इन सब के लिये शनि उस किये जाने वाले कार्य को करने के लिये अपने अपने अनुसार उन साधनों से दूर करता है जो कार्य मनुष्य अपने आराम के लिये करने के लिये उद्धत रहता है। प्रत्येक ग्रह अपने अपने अनुसार मनुष्य को कार्य करने की शिक्षा देता है। उन शिक्षाओं में सूर्य देखने के बाद कार्य करने की शिक्षा देता है,चन्द्रमा सोचने के बाद कार्य करने की शिक्षा देता है,मंगल हिम्मत से कार्य करने की शिक्षा देता है,बुध पूंछ पूंछ कर और महसूस करने के बाद कार्य करने की शिक्षा देता है,गुरु सम्बन्ध बनाकर और शिक्षा को लेकर ज्ञान को बढा कर कार्य करने की शिक्षा देता है,शुक्र भावनाओं को और प्रतिस्पर्धा को सामने रखकर एक दूसरे की कला को विकसित करने के बाद कार्य को करने की शिक्षा देता है,शनि मेहनत और कठिन समय में अन्धेरे में बिना साधनों के कार्य करने की शिक्षा देता है,राहु छुपी हुयी शक्ति के रूप मे कार्य करने की शिक्षा देता है,केतु सहायता लेकर कार्य करने की शिक्षा को देता है। जीवन में शनि का समय उन्नीस साल का होता है,और अन्य ग्रहों का अलग अलग समय नियत किया गया है। लेकिन शनि का साढेशाती का समय जीवन में लगभग छ: बार आता है,जिसमें तीन बार ऊपर उठने का और तीन बार नीचे गिरने का होता है। इस उठने और गिरने के समय में मनुष्य को कठिन समय का उपयोग करना पडता है,लेकिन जैसे ही वह कठिन समय को व्यतीत कर लेता है तो उसे आगे के जीवन में दूसरे ग्रहों से सम्बन्धित कार्य करने में दिक्कत नही आती है,वह अपने को किसी भी समय की विकट परिस्थितियों में काम करने का आदी हो जाता है।

ज्योतिष से साढेशाती का समय

जन्म राशि और नाम राशि से साढेसाती का समय जीवन में छ: बार आता है जिसमें तीन बार ऊपर उठाने का और तीन बार नीचे गिराने का माना जाता है। अक्सर साढेशाती का असर मनुष्य के चलते वाले नाम से अधिक माना जाता है। चन्द्र राशि से ही साढेशाती का प्रभाव अधिक होता है,कारण चन्द्रमा का रूप पानी के रूप में और मानसिक शक्ति से माना जाता है,शनि का प्रभाव बर्फ़ की तरह से ठंडा होता है काले अन्धेरे के रूप में यह जीवन में आता है,अगर व्यक्ति ने महसूस करने की शक्ति के साथ पराक्रम को पहले से इकट्ठा किया तो वह अपने साढेशाती के समय को आराम से गुजार जाता है। अगर वह अपने ऐशो आराम में लगा रहा और जीवन के पूर्व में ली जाने वाली शिक्षाओं को ध्यान से नही ग्रहण किया है,अपने अनुसार मनुष्य से सहायता लेने वाले कारकों को सहायता नही दी है,अपने धर्म को समाज को अपने साथ जीवन को गुजारने वाले लोगों को अपने निजी स्वार्थ के कारण दूर रखा है,भोगों की आदत मन में लेकर जो कार्य किये जाने थे उन्हे नही किया है,जीव जन्तु और प्रकृति के सहायक कारकों को अपनी जीभ और शरीर की पूर्ति के लिये बिना अपराध या बिना किसी कारण के हनन किया है तो शनि की साढेशाती के समय में उन सभे कारकों का बदला यह शनि लेकर मनुष्य को सही राह पर चलने की क्रिया को देता है। नाम या जन्म राशि से उठती हुयी साढेशाती बारहवें भाव,पहले भाव और दूसरे भाव के समय में शनि के गोचर के समय में देती है,नाम राशि या जन्म राशि गिरती हुयी साढेशाती शनि जब छठे भाव मे सातवें भाव में और आठवें भाव में गोचर करता है तब मिलती है। जब कठिन समय आता है तो लोग इस साढेशाती के प्रभाव से अपने अपने अनुसार भटकने लगते है,किसी धर्म से सम्बन्धित काम किया जाता है तो धर्म से सहायता देने वाला धर्मी हो जाता है,और सहायता देने के लिये हां या ना कुछ नही कर पाता है,अर्थ से सम्बन्धित सहायता लेने के लिये जिससे कोशिश की जाती है तो वह धन के लिये कभी हां और कभी ना करता है,कठिन काम करने के बाद केवल भोजन कभी कभी मिल जाता है,पत्नी पति और संतान के मामले में यह उनके द्वारा अधिक मांग करने और उनके द्वारा भटकने के कारण और अधिक दुख पैदा करने का असर देता है,अगर व्यक्ति मरना भी चाहे तो यह साढेशाती या तो मरने नही देती है और मरने भी देती है तो बहुत बुरी मौत देती है।

साढेशाती के समय में अन्य ग्रहों की सहायता

साढेशाती के समय में सूर्य सहायता देने के लिये तैयार होता है या सूर्य से सहायता देने के लिये कोशिश की जाती है तो सूर्य अपने अनुसार कार्य करने के लिये कहता है,लेकिन जातक पर शनि का असर होने के कारण वह सूर्य से की जाने वाली बातों और व्यवहार से दूर रहना चाहता है,सूर्य को पिता और जातक के ऊपर शनि का प्रभाव होने जातक को पुत्र माना जाये तो सूर्य शनि की पिता पुत्र की तरह से लडाई मानी जा सकती है।सूर्य अगर रोशनी का और दिन का राजा है तो शनि अन्धेरे और रात का राजा है,दोनो के मिलने का समय सुबह और शाम को होता है,या अन्धेरे से उजाले की तरफ़ जाने के समय या उजाले से अन्धेरे में जाने का समय माना जाता है। जातक के पिता के व्यवहार अगर अपने पिता से नही मिलते है तो जातक का पुत्र भी जातक से विद्रोह अपने अनुसार अपनी प्रक्रुति से करता है। सूर्य से सहायता लेने के वक्त अगर मनुष्य पिता से बनाकर चले और अपने पुत्र का कहना माने तो शनि अपने असर को कम करता है,और जीवन में मिलने वाली ठंडक में ऊष्मा का प्रभाव मिलता है,अगर वह धन से सम्बन्धित है तो धन के लिये और शरीर से सम्बन्धित है तो शरीर के लिये आराम देने वाला माना जाता है,अगर पिता पहले ही गुजर गये है तो पिता की आत्मा की शांति के लिये किये जाने वाले पितृ तर्पण आदि से जो अपने अपने धर्मों के अनुसार किये जाते के करवाने से या करने से शांति मिलती है,लेकिन शनि की साढेशाती को तो सहन करना ही पडेगा,शरीर के मामले में जरा सा चूकने पर शरीर पर शनि अपना असर देगा धन के मामले में जरा सा चूकने पर धन पर शनि अपना असर देगा,अक्सर साढेशाती के समय व्यक्ति को धन पर अधिक मार झेलनी पडती है,और जातक का बहता हुआ धन जो व्यापार नौकरी आदि से प्राप्त होता है वह फ़्रीज हो जाता है,यानी मनुष्य अपने ही धन को प्रयोग नही कर सकता है,उसे पता है कि उसके पास इतना धन है लेकिन वह या तो किसी सम्पत्ति के विवाद में फ़ंसा होगा या फ़िर उसने कोई मशीन या सामान ऐसा ले लिया होगा जो पास में तो है लेकिन वह या तो बिक नही रहा है या उसके अन्दर कोई ऐसी कमी है जिससे कोई उसे खरीद नही रहा है। इसी प्रकार से नौकरी करने वालों के साथ होता है,या तो नौकरी में नौकरी करवाने वाला पैसा नही दे रहा है,या किसी काम से नाखुश होकर कोई आरोप लगा दिया गया है,जिससे आरोप से मुक्ति के पहले नौकरी भी नही छूटती है और धन भी नही मिलता है,काम भी करना पड रहा है और धन भी नही मिल रहा है। इसी प्रकार से धन के लिये जो दुकान आदि की जाती है उसके अन्दर कोई सामान ऐसा लाकर रख लिया है जो बिकता नही है,या पहले ग्राहकों को जो सामान दिया जाता था उसके अन्दर अधिक मुनाफ़ा अन्जाने में कमा लिया है लेकिन उसी सामान को बाजार में कम मूल्य पर उसी ग्राहक के द्वारा ले लेने पर वह दुकान करने वाले के प्रति अपनी राय अन्य लोगों को बिना किसी कारण के देना शुरु कर देता है कि अमुक दुकानदार तो लुटेरा है और वह कम कीमत के सामान को अधिक कीमत में बेचता है,जिससे उसके जानकार और फ़िर जानकारों के जानकार उसके पास आना बन्द कर देते है,भले ही उसने वह सामान बेचना बंद कर दिया हो लेकिन पहले की चलने वाली बातें उसे अपना व्यवसाय नही करने देती है। इसी प्रकार से चन्द्र से सहायता लेने के लिये जब जातक कोई चन्द्रमा से सम्बन्धित उपाय करता है तो चन्द्रमा भी कुछ कहने के लिये तैयार नही होता है और अधिक चन्द्रमा का उपाय लिया जाये तो वह भी जातक की तरह से धीरे धीरे चुप होना शुरु हो जाता है,और अधिक दबाब चन्द्रमा पर दिया जाये तो वह भी फ़्रीज होना शुरु हो जाता है। मंगल से उपाय लेने और मंगल के उपाय करने के लिये जब कोई बात की जाती है तो मंगल की गर्मी भी अधिक शनि के प्रभाव के कारण शांत होनी शुरु हो जाती है और मंगल खुद जो चन्द्रमा के सहारे चलता है धीरे धीरे फ़्रीज होना चालू हो जाता है अपने रंग को तो बरकरार रखता है लेकिन उसकी शक्ति खत्म हो जाती है,बुध से उपाय लेने पर जब कोशिश की जाती है तो बात करने की शक्ति और महसूस करने की शक्ति भी बिना चन्द्रमा के नही प्रयोग में ले सकते है,वह भी या तो समय पर बात की नही जा सकती है या समय पर उपयोग में करने पर उसका गलत प्रभाव आना शुरु हो जाता है,अथवा की जाने वाली बातें और महसूस करने की ताकत ही खत्म हो जाती है,गुरु से उपाय लेने की कोशिश की जाती है तो गुरु भी शनि के असर से धर्मी हो जाता है,जातक जैसे बात करता है वैसी ही बात करने लगता है सहायता के समय हां मे हां और ना में ना करना शुरु कर देता है,जातक को किसी से दस रुपये पहले के उधारी के लेने है और वह गुरु का सहारा लेकर उसके पास मांगने जाता है तो जिससे दस रुपये लेने है वह अपने घर पर दो रुपये के लिये लड रहा होता है,गुरु का असर होने के कारण जातक अपनी जेब से दो रुपये और देकर उसके घर की लडाई को समाप्त करने के बाद खाली हाथ वापस आजाता है,इसी प्रकार से शुक्र से सहायता लेने के कारण अधिक से अधिक भौतिकता में शुक्र अपने कारणों से भेज देता है,दिमाग में जो भी धार्मिक बातें होती है उनको भी निकाल कर बाहर कर देता है,दिखाने के लिये तो वह बहुत करने की कोशिश करता है लाखों करोडों के स्वप्न दिखाने लगता है लेकिन देता कुछ नही है,शनि का प्रभाव शनि से दूर करने पर जो काम हाथ में होते है उन कामों के स्थान पर और काम बढ जाते है,और जातक पहले के ही काम करने के कारण अधिक थक गया होता है,इसलिये मिलने वाले कामों को वह नही कर पाता है,राहु से सहायता लेने के लिये वह जैसे ही जाता है तो या तो उसे सहायता पूरी तरह से मिल जाती है या वह जिस काम के लिये सहायता लेने के लिये गया था वह पूरी तरह से ही समाप्त हो जाता है,या जातक ही समाप्त हो जाता है,शनि के लिये सहायता जब केतु से ली जाती है तो सहायताये मिलने लगती है,जातक को धीरे धीरे सहारा मिलने लगता है और उसे अपने किये जाने वाले कामों में दम मिलने लगती है,केतु की सहायता मिलते ही गुरु अपना काम करने लगता है गुरु के साथ आते ही सूर्य भी अपना काम करने लगता है जैसे ही सूर्य अपने काम को करता है मंगल भी अपनी दम भरने लगता है और मंगल के आते ही बुध महसूस करने की शक्ति देने लगता है,जैसे ही काम चालू होते है वैसे ही शुक्र अपने अपने अनुसार सामने खडा होकर जी हुजूरी करने लगता है।

साढेशाती में शनि का बारहवें भाव में असर

बारहवां भाव जीवन की श्रेणी का अन्तिम भाव माना जाता है। ग्रह जब अपने अपने समय में बारहवें भाव में पहुंचते है तो वे अपने अपने अनुसार अपना अपना जीवन समाप्त करते है। लगन में जाकर उनका पुनर्जन्म होता है और वे अपनी अपनी जिन्दगी को नये शिरे से शुरु करने का असर शुरु कर देते है। सूर्य बारह महिने में अपना जीवन यहाँ समाप्त कर देता है और नये जीवन के लिये लगन में आगे चला जाता है,और जीवन के एक साल की समाप्ति हो जाती है,आगे की साल की शुरुआत वह लगन में जाकर शुरु कर देता है,चन्द्रमा सत्ताइस दिन में आकर अपने जीवन को यहाँ समाप्त कर लेता है और जीवन के एक माह की समाप्ति यहाँ हो जाती है लगन में जाकर फ़िर से नये मान की शुरुआत करना शुरु कर देता है,मंगल भी यहाँ तक आते आते लगभग एक से सवा साल का समय ले लेता है,और जितना भी पराक्रम हिम्मत साहस वह अपने समय में बटोर पाता है इस स्थान पर आकर उसे बिखेर कर लगन में जाकर नये पराक्रम को हिम्मत को साहस को भरना शुरु कर देता है,शरीर के पूरे गंदे खून की सफ़ाई इसी भाव में आकर मंगल करता है,बुध भी सूर्य के आगे पीछे रहकर महसूस करने की शक्ति और अपने संचार की सुविधा को यहां पर आकर समाप्त कर देता है फ़िर लगन में जाकर फ़िर से शुरु आत करता है,गुरु भी अपने अनुसार सम्बन्धों की समाप्ति इस स्थान पर करता है और नये शिरे से सम्बन्ध बनाने के लिये फ़िर से लगन में जाकर नये शिरे से अपने सम्बन्ध स्थापित करना शुरु कर देता है,शुक्र भी यहां तक आकर अपने जीवन की साजसज्जा को सम्पत्ति को बढा देता है और फ़िर लगन में जाकर नयी सम्पत्ति और शरीर के सौंदर्य को नये प्रकार से बनाना शुरु कर देता है,शनि भी पुराने कार्यो और रहने के स्थानों में अपना बदलाव करना शुरु कर देता है,जो भी शरीर स्थान कार्य आदि होते है सभी को समाप्त करने के बाद लगन में जाकर नये निर्माण को नये काम को नये रहने के स्थान को और नये नय बदलाव के प्रयोगों को करना शुरु कर देता है.राहु और केतु उल्टे चलते है,वे सही काम को तो लगन में ही छोड देते है और खराब कामों को लेकर सीधे ही समाप्ति की तरह बारहवें भाव में रख देते है,इसके अलावा केतु का कार्य भी अजीब होता है जो बारहवें भाव में सामान सभी ग्रहों के द्वारा समाप्त हो जाता है,उस सामान से जो काम लायक सामान बच जाता है उसे लेकर ग्यारहवें यानी लाभ भाव में लेजाकर पटक देते है,यही कार्य राहु का होता है,वह बारहवें भाव की बची शक्तियां अपने साथ लेकर ग्यारहवें भाव में चला जाता है,और उससे जातक को आगे के जीवन में फ़ायदा देने की कोशिश करता है। शनि बारहवें भाव में जाने से पहले जातक के ग्यारहवें भाव में होता है,जातक को लाभ भाव में होने के समय वह अधिक फ़ायदा का लालच देकर अधिक आराम का लालच देकर जातक के द्वारा पाले गये शरीर को जातक के द्वारा जमा किये धन को जातक के द्वारा पहले से बनाये गये घर आदि को अपने अपने अनुसार समाप्त करता है,जैसे शरीर की पालना के गयी है तो उसे लेजाकर घर से दूर पटक देगा जहां उसकी पहले की सभी उपयोग वाली वस्तुयें बदल गयी होंगी,वे नये अनुसार से जातक के द्वारा प्रयोग करने से और पहले की आदत को बदलने से जातक को कष्ट होगा,वह धीरे धीरे पुरानी आदतें पुराने रहने के साधन और कार्य आदि भूलता चला जायेगा,उसके शरीर के बाल खाल आदि में बदलाव आना शुरु हो जायेगा,जहां भी वह रह रहा होगा,वहीं के जलवायु के अनुसार उसका शरीर पनपने लगेगा,और पहले के शरीर का खात्मा होना शुरु हो जायेगा,पुराने निवास को समाप्त कर दिया जायेगा,नये निवास के निर्माण के लिये कोशिश की जाने लगेंगी,पुराने काम दूर जाने लगेंगे नये काम सामने आने लगेंगे,आदि बातें शनि के द्वारा प्रदान की जाती है,जैसे जातक का जन्म हुआ उस समय शनि की डिग्री कम थी तो जातक का बदलाव कम दूरी पर होगा,और जातक का जन्म अधिक डिग्री पर हुआ है तो जातक के शनि के बारहवें भाव में जाने के समय जातक का विदेश जाना और जन्म स्थान से दूरी बनाना जरूरी हो जायेगा,इसके साथ ही जातक के शनि को यह भी समझना पडेगा कि शनि पैदा होने के समय स्थिर राशि में था या अस्थिर राशि में था या द्विस्वभाव राशि में था,अगर स्थिर राशि में है तो उसके साथ जो भी काम होगा वह हमेशा के लिये ही होगा,जैसे उसने अगर स्थान रहने वाला बदला है तो हमेशा के लिये ही बद्ल लेगा,अस्थिर राशि में है तो वह उस स्थान को बदलेगा भी और समय आने पर वापस भी आयेगा,द्विस्वभाव में अगर है तो वह दूसरा निवास भी बनायेगा और जहां रह रहा है वहां भी रहेगा.इसी प्रकार से कार्यों के लिये माना जाता है.लेकिन एक बाद याद कर लेनी चाहिये कि शनि स्वयं में असमर्थ है,उसके दो सहयोगी राहु और केतु उसकी शक्ति है,राहु उसे बनाने या बिगाडने की हिम्मत देता है और केतु बिगाड कर दुबारा से बनाने या बनाकर दुबारा से बिगाडने की हिम्मत देता है,शनि इन दोनो छाया ग्रहों की सहायता से ही सभी बाकी ग्रहों की शक्ति को अवशोषित करता है और जातको देता है।

लगन में शनि का साढेशाती के समय का प्रभाव

लगन को जन्म स्थान माना जाता है,यहां से चन्द्र राशि से या नाम राशि से कोई भी ग्रह अपना नया जीवन शुरु कर देता है। शनि इस भाव में पुराने सभी कार्यों स्थानों और सामानों को त्याग कर नये काम स्थान और सामान आदि की पूर्ति चालू करने का कार्य करता है,नौकरी करने वालों के लिये ट्रांसफ़र आदि करवाने के बाद काम का बदलाव करता है,व्यवसाय करने वालों को व्यवसाय को बदल कर या व्यवसाय में कोई दूसरा रूप शामिल करने के बाद नये व्यवसाय को नये नाम से शुरु करता है,रहने वाले स्थान को भी नये स्थान के रूप में बदलने की क्रिया करता है,जब कोई नया रूप सामने होता है तो जातक को नये काम के लिये जद्दोजहद तो करनी ही होती है,नये स्थान पर जाने के बाद नये मकान का निर्माण नये पानी बिजली पेड पौधे आदि का बन्दोबस्त नये लोगों से जानकारी करना आदि माना जाता है,नये काम को करने के लिये भी नयी नयी विद्या नये नये सामान और नये नये लोगों से सम्पर्क करना पडता है,नये शरीर की गति को बदलने के लिये नये स्थान का पानी भोजन आदि की व्यवस्था से अपने शरीर को उसी पानी और हवा के अनुसार ढालना पडता है। इन कार्यों में जातक को बदलाव में जो परेशानी आती है वे अगर पहले से सही सीख लेकर जातक अपने कार्यों को करता है,झुक कर चलना जानता है तो शनि अपना असर कम देता है और जो अपने अहम के कारण कोई कार्य करना चाहते है बदले में किसी का अहसान भी नही लेना चाहते है,या अपने कर्मो या लोभ के कारण ऐसे स्थान पर चले गये है जहां भाषा व्यवहार सभी कुछ अलग ही है तो उन्हे बहुत कष्ट होता है,उस कष्ट से बचने के लिये जातको केतु का सहारा लेना जरूरी होता है,केतु का सहारा लेते ही जातक को अच्छे फ़ल मिलने लगते है,और वह धीरे धीरे अपने अनुसार आगे की बढोत्तरी करने लगता है।

दूसरे भाव में शनि की साढेशाती का प्रभाव

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