प्रश्न विचार द्वादस भाव

कहा जाता है कि दुनिया गोल है और इस गोल दुनिया के बारे मे जानने के लिये एक श्रेणी को अपनाया जाना बहुत ही हितकारी है.जैसे एक महिना तीस दिन का होता है और सूर्य एक एक दिन की सीमा को तय करता हुआ तीन सौ पैंसठ दिन मे पृथ्वी से अपनी एक परिक्रमा करवा लेता है,उसी प्रकार से किसी भी व्यक्ति के बारे मे जानने के लिये उस व्यक्ति की इतने दिनो की नही तो इतनी डिग्री की परिक्रमा कर लेनी जरूरी होती है,इस परिक्रमा को करने के लिये ज्योतिष से उस व्यक्ति के चारो तरफ़ चक्कर नही लगाने पडते है,बस उसके लिये एक लगन कुंडली बनाकर उसकी तीन सौ साठ डिग्री में घूमना पडता है। जिस समय जो व्यक्ति प्रश्न करने के लिये पास मे आता है वह उसकी जन्म कुंडली होती है वह चाहे अपने घर मे साठ साल पहले पैदा हो गया हो लेकिन तुम्हारे पास तो वह आज ही इसी समय आया है इसलिये हमे तो यह देखना है कि यह है क्या,अगर विवेक और ज्ञान को प्राप्त किया है तो जरूरी है कि तुम उसके बारे वह सब जान जाओगे जो वह अपनी जन्म कुंडली को बनवा कर भी साठ साल की उम्र मे नही जान पाया है.इस जानकारी के लिये सबसे पहले आपको अपने कम्पयूटर को खोलना है जो भी सोफ़्टवेयर तुमने डाल रखा है उस मे केवल उसी समय का लगन निकालना है.जब लगन सामने है तो वह बारह भावो को भी सामने रखेगा,और जब बारह भाव सामने होंगे तो उसकी भावना का भी पता चल जायेगा.लगन मे जो राशि होगी वही उसकी प्रकृति होगी जो ग्रह जहां होगा उतनी शक्ति उसके उस भाव मे होगी। भावो का वर्गीकरण वैसे मै पहले ही कर आया हूँ और अधिक जानकारी के लिये आप इस साइट के बायीं तरफ़ देखेंगे तो आपको सभी बाते मिल जायेंगी लेकिन पढना तो आपको ही पढेगा और पढकर समझना भी आपको ही होगा,हम तो ठहरे केवल समझाने वाले वह भी भदौरिया जी के अन्दर जितनी बुद्धि है उसी के अनुसार ही समझा सकते है.

बारह भावो का सूक्ष्म निरीक्षण

व्यक्ति के चारो तरफ़ उसके आगे पीछे दाहिने बायें ऊपर नीचे घूमने की बजाय जब कुंडली को देखेंगे तो उसके अन्दर पूरे भाव आ जायेंगे और एक साथ तीन सौ साठ डिग्री को नापने की बजाय भदौरिया जी एक फ़ार्मूला जो वैदिक शास्त्रो मे मिला है बता रहे है। तीन सौ साठ जो तीस तीस के हिस्से मे अगर बांट देते है तो कुल मिलाकर बारह भाव बन जायेंगे और जीवन को अगर बारह हिस्सो में बांट दिया जाये तो जीवन के बारह हिस्से हो जायेंगे और वही बारह हिस्से व्यक्ति के शरीर के प्रति व्यक्ति के खानदान के प्रति व्यक्ति के चाल चलन के प्रति व्यक्ति की माता के प्रति सन्तान के प्रति उसके रोजाना के कामो के प्रति उसके जीवन साथी के प्रति वह कितना होशियार है उसके पास कितना धर्म है भाग्य है वह कितना कर्मशील है वह कितना कमा सकता है वह कितना खर्च कर सकता है आदि बातो के लिये सभी प्रकार की जानकारी सामने आने लगेगी.जब सभी प्रकार की जानकारी सामने है तो व्यक्ति का नाम भी आजायेगा व्यक्ति के पिता का नाम भी आजायेगा व्यक्ति की माता का नाम भाई बहिन का नाम सभी कुछ कुंडली के द्वारा सामने आ जायेगा.यहां पर आपको उदाहरण देने की जरूरत पडेगी अन्यथा आप कैसे समझ पायेंगे और मन ही मन से भदौरिया जी को उल्टा सीधा कहेंगे.

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यह एक उतर भारत की रीति से बनी हुयी कुंडली है,इस कुंडली का पहला भाव कुंभ लगन का है यानी जब यह व्यक्ति अपने पास आया तो उस समय कुम्भ लगन थी,दूसरे भाव मे मीन लगन है इन भावो को नम्बर से लिखा गया है और कुम्भ का ग्यारह मीन का बारह इस प्रकार से बायीं तरफ़ को गिनना शुरु कर देते है फ़िर एक दो तीन इसी प्रकार बारहवे भाव तक मकर राशि का आना हो जायेगा.सबसे पहले इस व्यक्ति के बारे मे जानने के लिये नाम के बारे मे जानने की कोशिश करेंगे,कुम्भ लगन का स्वामी शनि है और शनि कुम्भ लगन मे ही है और यह लगन बडे भाई की कारक है तो इसके बारे मे यह बात तो पक्की हो गयी कि यह अपने भाई बहिनो मे बडा भाई है,नाम के लिये पहिचान बताने की जरूरत पडती है एक हजार आदमी बैठे हो और इस नाम को बुलाया जाये तो वह व्यक्ति जो इस नाम का ही है सामने आये तो कुंडली सही है,नाम के लिये तीसरे भाव को देखना जरूरी है,क्योंकि व्यक्ति बारे मे पहिचान तीसरे भाव से मिलती है,तीसरे भाव का मालिक मंगल है जो आसमान की राशि मीन मे विराजमान है.और इस राशि मे बुध वक्री होकर बैठ गया है,ध्यान यहां लगाना पडेगा कि नाम वही होना चाहिये जो इस राशि का प्रभुत्व रखता है,इस राशि का मालिक गुरु है और गुरु के अनुसार नाम होना चाहिये अब गुरु को देखते है तो वह राहु के साथ चौथे भाव मे विराजमान है,राहु की आदत होती है कि जिस ग्रह के साथ बैठ जाता है उसके असर के अन्दर अपना असर शामिल कर देता है,गुरु भी आसमान का राजा है और वह भी राहु की तरह ही अपना असर प्रदान कर रहा है यानी इस व्यक्ति का नाम राहु नामक ग्रह के अनुसार ही राहु से शुरु होना चाहिये,वस्तव मे इस व्यक्ति का नाम राहुल है.इसके बाद इसके पिता माता और बहिन भाई के बारे मे भी जानना जरूरी है.जब कुंडली का मालिक राहु या केतु हो जाता है तो कुंडली को बजाय सीधे पढने के उल्टा पढना शुरु कर देते है,कारण इन दोनो ग्रहों की चाल ही उल्टी होती है। जो लोग राहु केतु को एक तीन पांच सात नौ भावो के स्थानो पर पडने वाली द्रिष्टि को देखते है उन्हे सभी ग्रहो के बराबर नही देखना चाहिये जो ग्रह उल्टा देखता है यानी वक्री है उसे पीछे से देखने पर फ़लादेश करने मे सत्यता मिलेगी और जो ग्रह अस्त है उसके बारे मे फ़लादेश करने से कोई फ़ायदा भी नही है वह जहां है वहीं पर अपनी स्थिति को आजीवन देगा तथा राहु केतु के बारे मे हमेशा उल्टी गिनती ही गिनी जायेगी.राहु के साथ गुरु है और राहु ने अपनी जगह शुक्र की राशि वृष मे बना रखी है,तो राहु का स्थान शुक्र की पुरुष राशि मे हो गया है और केतु अपनी उल्टी नवम द्रिष्टि से बल मंगल और सूर्य का दे रहे है तो जातक के साथ बैठा गुरु जातक का छोटा भाई है,राहु का स्थान आसमान से जाना जाता है लेकिन मेष राशि से तो आसमान होता है लेकिन वृष राशि से उकाश होना चाहिये इस शब्द को लिखने के लिये वकास या विकास की सटीकता लेनी पडेगी,यानी दूसरे भाई का नाम विकास है.

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