रामेश्वरम या गयाजी में पिंडदान

गया में पिंडदान करने से मनुष्य अपने पितरों का उद्धार करता है। प्रभास अत्रि ने शिला के चरणप्रान्त को आच्छादित कर रखा है। मुनियों ने संतुष्ट हुये प्रभास शिला के अंगुष्ठभाग से प्रकट हुये। अंगुष्ठभाग में ही भगवान शंकर स्थित है। इसलिये वे प्रभासेश कहे गये है। शिला के अंगुष्ठ जो एक देश है,उसी में प्रभासेश की स्थिति है और वही प्रेअशिला की स्थिति है वहां पिंडदान करने से मनुष्य प्रेतयोनि से मुक्त हो जाता है,इसलिये उसका नाम प्रेत शिला है। महानदी तथा प्रभासात्रि के संगम में स्नान करने वाला पुरुष साक्षात वामदेव (शिव) स्वरूप हो जाता है। इसलिये उक्त संगम को वामतीर्थ कहा गया है। देवताओं के प्रार्थना करने पर भगवान श्रीराम ने जब महानदी में स्नान किया,तभी से वहां सम्पूर्ण लोकों को पवित्र करने वाला रामतीर्थ प्रकट हुआ। मनुष्य अपने सहस्त्रों जन्मों में जो पापराशि संग्रह करता है,वह रामतीर्थ में स्नान करने मात्र से नष्ट हो जाती है। जो मनुष्य -"राम राम महाबाहो देवानामभयंकर,त्वां नमस्ये तु देवेश मम नश्यन्तु पातकम",अर्थात महाबाहु राम ! देवताओं को अभय देने वाले श्रीराम ! आपको नमस्कार करता हूँ,देवेश ! मेरा पातक नष्ट होजाये",इस मंत्र द्वारा रामतीर्थ में स्नान करके श्राद्ध एवं पिण्डदान करता है,वह विष्णुलोक में प्रतिष्टित हो जाता है। प्रभासेश्वर को नमस्कार करके भासमान शिव के समीप जाना चाहिये और उन भगवान शिव को नमस्कार करके यमराज को बलि दे और इस प्रकार कहे-"देवेश ! आप ही जल है तथा आप ही ज्योतियों के अधिपति है,आप मेरे मन वचन और शरीर और क्रिया द्वारा उत्पन्न हुये समस्त पापों का शीघ्र नाश कीजिये",शिला के जघन प्रदेश को यमराज ने दबा रखा है,धर्मराज ने पर्वत से कहा,"न गच्छ" (गमन न करो,हिलो डुलो मत) इसलिये पर्वत को नग कहा जाता है,यमराज को बलि देने के पश्चात उनके दो कुत्तों को भी अन्न की बलि या पिंडदान करना चाहिये,उस इस प्रकार से कहे -"वैवस्तकुल में उत्पन्न जो दो श्याम और सबल नाम वाले कुत्ते है,उनके लिये मैं पिंडदान दूंगा,वे दोनो हिंसा नही करें",तत्पश्चात प्रेतशिला आदि तीर्थ में घी युक्त चरु के द्वारा पिंड बनावे और पितरों का आवाहन करके मन्त्रोच्चारण पूर्वक उनके लिये पिंड दे,प्रेत शिला पर पवित्र चित्त हो जनेऊ को अपसव्य करके दक्षिण दिशा की और मुंह किये हुये पितरों का ध्यान एवं स्मरण करे-"कव्यवाहक अनल सोम यम अर्यमा अग्निष्वात बहिर्षद और सोमपा ये सब पितृ देवता है,हे महाभाग पितृ देवताओ ! आप यहां पधारे,और आपके द्वारा सुरक्षित मेरे पितर एवं मेरे कुल में उत्पन्न हुये जो मेरे भाई बन्धु हों वे भी यहां आवेम,मैं उन सबको पिंड देने के लिये इस गया तीर्थ में आया हूँ। यह सब के सब श्राद्ध दान से अक्षय तृप्ति लाभ करें।

इसके बाद आचमन करके पंचांग न्यास पूर्वक यत्न करके प्राणायाम करे,फ़िर देश काल आदि का उच्चारण करके -"अस्मत पितृणां पुनरावृत्तिरहितब्रह्मलोकाप्तिहेतवेगयाश्राद्धमहं करिष्ये" (अपने पितरों को पुनरावृत्ति रहित ब्रह्मलोक की प्राप्ति कराने के लिये मैं गया श्राद्ध करूंगा) ऐसा संकल्प करके शास्त्रोक्त विधि से श्राद्ध करे। अथवा श्राद्ध हेतु राशि अपने हाथ में ग्रहण करके इस संकल्प को लेकर ब्राह्मण या उपयुक्त व्यक्ति को श्राद्ध हेतु प्रदान करे। पहले श्राद्ध स्थान को पंच गव्य या शुद्ध जल से सींचे और पुण्य मय बनाये,उसके बाद मंत्रों से गये हुये पितरों के निमित्त उनके नाम से पिंड दान करे। पहले सपिंड पितरों को श्राद्ध पिंड देकर उनके दक्षिण भाग में कुश बिछाकर उनके लिये एक बार तिल और जल की अंजलि दे। अंजलि मे तिल और जल लेकर यत्न पूर्वक पितृ तीर्थ से उनके लिये अंजलि देनी चाहिये। फ़िर एक मुट्ठी सत्तू से अक्षय पिंड दे,पिंड द्रव्यों में तिल घी दही और शहद मिलाना चाहिये। सम्बन्धियों का तिल आदि से कुशो पर आवाहन करना चाहिये। श्राद्ध में माता पितामही और प्रपितामही के लिये जो तीन मंत्र वाक्य बोले जाते है,उनमें यथा स्थान स्त्रीलिंग का उच्चारण करना चाहिये। सम्बन्धियों के लिये,या यजमान के लिये भी पूर्ववत पितरों का आवाहन करते हुये पहले की भांति ही पिंड दान करे। अपने गोत्र में या यजमान के गोत्र में पति पत्नी के लिये भी अलग अलग श्राद्ध पिंडदान और तर्पण अगर नही किया जाता है तो श्राद्ध व्यर्थ ही कहा जाता है। पिंडपात्र में तिल देकर उसे शुभ जल से भर दे,और मंत्र पाठ द्वारा उस जल से प्रदिक्षण क्रम से उन सब पिंडों को तीन बार सींचे। उसके बाद प्रणाम करके क्षमायाचना करे,फ़िर पितरों का विसर्जन करके आचमन करने के बाद साक्षी देवताओं को सुना दे,इसी प्रकार से बद्रीनाथ रामेश्वरम गया सोमनाथ हरिद्वार और पवित्र तीर्थ स्थान में पिंडदान करे। चूंकि पितरों का स्थान पृथ्वी और चन्द्रमा सूर्य के दक्षिण स्थान में होता है,इसलिये रामेश्वरम में पिंडदान देना सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। गया और रामेश्वरम में पिंडदान करते समय मुहूर्त का विचार नही किया जाता है। मलमास हो जन्म दिन हो गुरु और शुक्र अस्त हों अथवा गुरु सिंह राशि पर हो तो भी श्राद्ध को करना चाहिये। सन्यासी गया में जाकर दण्ड दिखावे पिंडदान नही करे। वह भगवान विष्णु के पैरों में दण्ड रखने से ही पितरों सहित मुक्त हो जाता है। गया में या रामेश्वरम में खीर सत्तू आटा चरु घी और तिल युक्त पके चावल आदि से पिंडदान किया जाता है। गया और रामेश्वरम के दर्शन करके पापी भी श्राद्ध कर्म का अधिकारी हो जाता है। वह श्राद्ध कर्म को करने से ब्रह्मलोक का भागी होता है। गया के फ़ल्गुतीर्थ और रामेश्वरम में अग्नितीर्थ के ईशान में श्राद्ध करने वाला मनुष्य एक लाख अश्वमेध यज्ञ करने का फ़ल पाता है।

पिंडदान के समय जो प्रार्थना की जाती है उसके अनुसार श्राद्धकर्ता को अपने लिये या यजमान के लिये इस प्रकार से प्रार्थना करे - " पिता पितामह प्रपितामह माता पितामही प्रपितामही मातामह मातामह के पिता प्रमातामह आदि इन सबके लिये मेरा दिया हुआ पिंडदान अक्षय होकर प्राप्त हो,मेरे या मेरे यजमान (नाम और गोत्र का नाम लेकर) भाई बहिनो कुल के सदस्यों मित्रों में जिनकी उत्तम गति नही हुयी है,उनके उद्धार के लिये पिंडदान देता हूँ। जो फ़ांसी पर लटक कर मरे है,जो जहर खाने से मरे है,या जो शस्त्र आदि से मरे है,वे आत्मघाती है उनके लिये भी पिंडदान करता हूँ,जो यमदूतों के आधीन होकर नरक आदि में यातनायें भोग रहे होते है और जिनकी यातनाओं के अंश हमारे परिवार या जिनके लिये हम पिंडदान कर रहे है उनके परिवार के सदस्यों को तिल तिल कर जला रहे है,दुख दे रहे है,दैहिक दैविक या भौतिक रूप से व्यर्थ में परेशान हो रहे है,उनके लिये पिंडदान करता हूँ। जो पशु योनि में पडे है,पक्षी या कीट या सर्प शरीर में है,अथवा जो वृक्ष योनि में है,उन्हे पिंडदान देता हूँ। जो धरती के अन्दर निवास करने वाले है आकाश में विचरण करने वाले है जो धरती पर भाई बन्धु या मित्र या यजमान के रूप में उपस्थित है,तथा उनके सम्बन्धी जिनकी संस्कार ही अवस्था में मृत्यु हुयी है,उन्हे मैं पिंडदान देता हूँ। जो मेरे भाई बन्धु है या जो दूसरे जन्मो में मेरे भाई बन्धु रहे हो,उनके लिये दिया हुआ पिंडदान अक्षय होकर उन्हे तृप्ति दे। जो मेरे या मेरे यजमान के पिता के कुल में मरे है,जो माता के कुल में मरे है,जो गुरु के कुल में मरे है,जो ससुराल के कुल में मरे है,अथवा जिनका पिंडदान नही हुआ है,जो स्त्री और संतान से हीन रह कर मरे है,जिन्होने बुद्धि के भ्रम से श्राद्ध कर्म या संस्कारों का त्याग कर दिया था और उसके बाद उनकी मृत्यु हुयी है,जो जन्म से अन्धे रहे थे,पंगु रहे थे,जो मेरे परिचित या जो मेरे अपरिचित होने के बाद भी मुझसे स्नेह रखते थे,उनके लिये मैं पिंडदान देता हूँ,उन्हे अक्षय भाव से तृप्ति प्राप्त हो। ब्रह्मा शिव और विष्णु देवता इस पिंडदान के साक्षी रहें। मैने गया या रामेश्वरम में आकर पितरों का उद्धार किया है,हे देव गदाधर ! मैं पितृ कार्य श्राद्ध के लिये गया या रामेश्वरम में आया हूँ,भगवन ! आप ही इस बात के साक्षी है,मैं तीनो ऋणों से मुक्त हो गया हूँ।

दूसरे दिन का पितृ तर्पण

पहले दिन पिंडदान और तर्पण करने के बाद दूसरे दिन की तर्पण क्रिया को किये बिना तर्पण पूरा नही होता है। दूसरे दिन के क्रिया के लिये पवित्र होकर गया में प्रेत पर्वत पर और रमेश्वरम में अग्नि तीर्थ पर जाये। गया में ब्रह्म कुण्ड में और रामेश्वरम में अग्नि तीर्थ में स्नान करे। स्नान करते समय पहले से साथ में ले जाये गये फ़ूल चावल तिल और केले नारियल आदि से जो भी इष्ट मन में हो उसका अथवा सूर्य को तर्पण करे। फ़िर पवित्र होकर गया में प्रेत पर्वत पर और रामेश्वरम में ईशान में स्थिति शिवलिंग के पास जाय। वहाँ भूमि को पवित्र करने के बाद रेत का या मिट्टी का उसी पवित्र जमीन से शिव लिंग का निर्माण करे,जल लहरी का निर्माण समुद्र या नदी की तरफ़ करे,जल लहरी से निकली मिट्टी का ही शिवलिंग बनाये। उस शिवलिंग पर पहले हल्दी फ़िर कुम कुम चावल अर्पण करने के बाद फ़ूलों को अर्पण करे,उसके बाद तिल बायें हाथ में लेकर पितरों का आवाहन मय नाम और गोत्र के करे,आवाहन के समय तिलों को शिवलिंग पर छोडता जाये। संकल्प लेकर जितने पितरों का पिंडदान करना है उतने पिंडों को पहले ही पके चावलों में तिल और घी मिलाकर लड्डू बनाकर रख ले,या सत्तू और तिल मिलाकर पिंडों का निर्माण कर ले। प्रत्येक पितृ के नाम से दाहिने हाथ से पकड कर मंत्र बोलकर पहले से बिछाये कुश या केले के पत्ते पर अंगूठे की तरफ़ से पिंडदान करे। पहले परम उत्तम पितरों का नाम और गोत्र का उच्चारण करने के बाद पिडदान दे। मनुष्य पितृ तर्पण में जितने तिलों को प्रयोग में लेता है उतने ही असुर भयभीत होकर इस प्रकार से उस स्थान से भागते है जैसे गरुण को देखकर सर्प भागते है। उस स्थान पर श्रद्धा और भावना से चावलों में तिल और घी मिले पिंडों से या सत्तू में तिल मिले पिंडों से पितरों को तृप्त करे,और इस प्रकार से प्रार्थना करे-" ये केचित प्रेत रूपेण वर्तन्ते पितरो मम (या यजमान का नाम),ते सर्वे तृप्ति मायन्तु सक्तू (तन्दुल) घृत मिस्तिल मिश्रितै:॥ आ ब्रह्मस्तम्ब पर्यंतम यत किंचित सचराचरम,मया (या यजमान का नाम) पिण्डेन तृप्ति मायान्तु सर्वश:॥" जो कोई मेरे (या यजमान) के पितर प्रेत रूप में विद्यमान है,वे सभी इन तिल मिश्रित चावल (या सत्तू) के दान से तृप्ति लाभ लें। ब्रह्माजी से लेकर कीटपर्यन्त जो भी चराचर जगत है,वह मेरे दिये हुये पिंडदान से पूर्णत: तृप्त हो जाये।

पितृ तर्पण की मंत्रो सहित पूर्ण विधि

सबसे पहले पांचों तीर्थों में (गया,रामेश्वरम,बद्रीनाथ में ब्रह्मकपाल,पुष्कर,हरिद्वार) जिसमे भी पितृ तर्पण करना है,भावना बनते ही तर्पण के लिये जाये। नदी या सरोवर या समुद्र में हाथ में कुश लेकर आचमन करे,फ़िर कुशों के अन्दर जल लेकर अपने मस्तक पर छींटे दे,फ़िर इस मंत्र के साथ स्नान करे-" उत्तरे मानसे स्नानं करोम्यात्म विशुद्धये। सूर्य लोकादि सम्प्राप्ति सिद्धये पितृ मुक्तये॥
अर्थात- मैं उत्तर मानस में आत्म शुद्धि सूर्यादि लोकों की प्राप्ति तथा पितरों की मुक्ति के लिये स्नान करता हूँ।
इस प्रकार स्नान करके विधिपूर्वक देवता आदि का तर्पण करे,और अन्त में इस प्रकार से कहे-
आ ब्रह्मस्तम्ब पर्यन्तम देवऋषि पितृ मानवा:। तृप्यन्तु पितर: सर्वे मातृ मातामहादय:॥
अर्थात- ब्रह्माजी से लेकर कीट पर्यन्त समस्त जगत देवता ऋषि दिव्य पितर मनुष्य पिता पितामह प्रपितामह माता मातामही प्रपितामही मातामह प्रमातामह आदि स्ब लोग तृप्त हो जायें।

श्राद्ध के वर्ण व्यवस्थानुसार रूप

चार वर्ण के मनुष्य अपने अपने गृहसूत्र के अनुसार श्राद्ध करते है। चारों वर्णों के मनुष्यों के लिये चार अलग अलग तीर्थों का विवेचन किया गया है। जो लोग दिमागी कार्यों से पूर्ण है जो शरीर बल को प्रयोग नही करते है उनके लिये अष्टकाश्राद्ध का रूप बताया गया है। इस वर्ण के मनुष्य ब्राह्मण वर्ण के लोगों में गिने जाते है,(सांसारिक जातियों के अनुसार प्राचीन काल में गिना जाता था),इनके लिये बद्रीनाथ में ब्रह्मकपाल को मुख्य स्थान बताया गया है,इसके बाद क्षत्रिय वर्ण के लोगों के लिये जो तामसी भोजन और रक्षा करने वाले कार्य तथा शारीरिक श्रम को महत्व देते है उनके लिये गृहसूत्र में गया में प्रेत कपाल और रामेश्वरम को मुख्य स्थान माना गया है,इसके बाद जो लोग व्यापारिक कार्यों में लगे है,और खरीद बेच का कार्य करने के बाद अपने जीवन को चलाते है उनके लिये सोमनाथ और रामेश्वरम के साथ कनखल को मुख्य स्थान माना गया है। इसके बाद जो लोग नौकरी सर्विस तथा सेवा वाले कार्य करते है उनके लिये क्षयाह यानी रामेश्वरम,कन्याकुमारी,सुचिन्द्रम,गया,सोमनाथ और पुष्कर के तीर्थ बताये गये है। लेकिन एकोदिष्ट श्राद्ध स्थान में (रामेश्वरम,गया,हरिद्वार,ब्रह्मावर्त (कानपुर),त्रिवेणी (इलाहाबाद),कनखल,बद्रीनाथ के ब्रह्मकपाल,पंचप्रयाग (प्रयाग,रुद्रप्रयाग,विष्णु प्रयाग आदि) असहाय लोगों के लिये ग्राम या शहर में तीर्थ स्थान जहां विशेष पर्व पर स्नान किया जाता है,पुष्कर) में माता के लिये पृथक श्राद्ध करना जरूरी माना जाता है।

पितरों के रूप में ग्रहों की पूजा

सूर्य के आधीन सभी ग्रहों को माना जाता है,एक सूर्य के अलग अलग रूप ही ग्रह के नाम से जाने जाते है। चन्द्र मंगल बुध गुरु शुक्र शनि राहु केतु यह सभी सूर्य के ही अलग अलग रूप है-
ऊँ नमोऽस्तु भानवे भर्त्रे सोमभौमश्च रूपिणे,जीव भार्गव शनैश्चर राहु केतु स्वरूपिणे॥
अर्थात- सोम मंगल बुध बृहस्पति शुक्र शनैश्चर राहु तथा केतु ये सब जिनके स्वरूप है,सबका भरण पोषण करने वाले उन भगवान सूर्य को नमस्कार है।
इस मन्त्र से भगवान सूर्य को नमस्कार करके उनकी पूजा करे,ऐसा करने वाला पुरुष अपने पितरों को सूर्य लोक में स्थान देता और उन्हे आदर से पहुंचा देता है। मानसरोवर पूर्वोक्त प्रेत पर्वत (गया) रामेश्वरम आदि से यह उत्तर में (बद्रीनाथ ब्रह्मकपाल) स्थित है। इसी को उत्तरमानस कहते है। बद्रीनाथ से (उत्तरमानस) से दक्षिण मानस की यात्रा मौन होकर करनी चाहिये,पहले कनखल तीर्थ है जो गृहसूत्र के अनुसार वर्णित मनुष्यों के पितरों को उत्तम गति देने वाला है,वहां स्नान करने के बाद मनुष्य का जीवन पितरों की कृपा से प्रकाशित होने वाला है। इस तीर्थ से दक्षिण में रामेश्वरम तीर्थ स्थिति है,जिसे दक्षिण मानस तीर्थ कहा जाता है। यहाँ बाइस कुंड और तीन महान कुंड (सीता कुंड,राम कुंड,लक्ष्मण कुंड) तथा भगवान शिव के हमेशा सामने रहने वाले तथा माता उज्जयनी के पृष्ठ भाग में स्थिति अग्नि तीर्थ के स्नान का स्थान है। उन सबमें विधि पूर्वक स्नान करना चाहिये इन सभी स्नान के समय यह मंत्र मन में उच्चारण करता जाये-
दिवाकर करोमीह स्नानं दक्षिणमानसे। ब्रह्महत्यादि पापौघघातनाय विसुक्तये॥
अर्थात- भगवान दिवाकर ! मैं ब्रह्महत्या आदि पापों के समुदाय का नाश करने और शांति (मोक्ष) पाने के लिये यहां दक्षिण मानस में स्नान करता हूँ। यहाँ स्नान पूजन आदि करके पिंड सहित श्राद्ध करे,और अन्त में पुन: भगवान सूर्य को प्रणाम करते हुये इस मंत्र का ध्यान करे-
नमामि सूर्यं तृपत्यर्थम पितृणां तारणाय च। पुत्र पौत्र धनैश्वर्याद्यायुरारोग्यवृद्धये॥
अर्थात- मैं पितरों की तृप्ति तथा उद्धार के लिये और पुत्र पौत्र धन ऐश्वर्य आदि आयु तथा आरोग्य की वृद्धि के लिये भगवान सूर्य को प्रणाम करता हूँ।
इस प्रकार से मौन भाव से सूर्य का दर्शन करे,और पूजन आदि करके इस मंत्र का उच्चारण करे-
कव्यवाडादयो ये च पितृनां देववास्तथा। मदीयैं पितृभि: सार्द्धं तर्पिता: स्थ स्वधाभुज:॥
अर्थात- कव्यवाड अनल आदि जो पितरों के देवता है,वे मेरे पितरों के साथ तृप्त होकर स्वधा का उपभोग करें।

रामेश्वरम तीर्थ की महत्ता

सभी तीर्थों में अगर नही जा सके तो परम उत्तम रामेश्वरम तीर्थ को जाये। वहां श्राद्ध करने से सदा पितरों की तथा श्राद्ध कर्ता की भी मुक्ति होती है। पूर्वकाल में ब्रह्मा और पृथ्वी की प्रार्थना से भगवान विष्णु मनुष्य रूप में प्रकट हुये थे,उन्होने दानवों से पृथ्वी को विहीन किया था। दक्षिणाग्नि में जो ब्रह्माजी ने होम किया था,उसके धूम्र से वहां के निवासी काले रंग के हो गये थे। भगवान विष्णु ने स्वयं ही सभी शक्तियों के साथ इस तीर्थ का निर्माण किया था,तथा गंधमादन नामक पर्वत पर अपने चरण का चिन्ह छोडा था,कलयुग में वही चरण चिन्ह मनुष्य को मोक्ष देने के लिये माना जाता है। जो इस तीर्थ में स्नान आदि करता है उसके घर में लक्ष्मी फ़लती फ़ूलती है,वहां की जाने वाली पूजा से वहां की गाय कामधेनु रूप में मनोवांछित फ़ल देती है,वहां का जल और भूतल भी मनोवांछित फ़ल देता है। सृष्टि के अन्तर्गत रामेश्वरम तीर्थ कभी निष्फ़ल नही होता है। समस्तो लोकों में वही सम्पूर्ण तीर्थ है। रामेश्वरम तीर्थ में भगवान आदि गदाधर ने अपने मनुष्य रूप से भगवान शिव को जल बन्धन करने के बाद स्थापित किया है,और स्वयं उस तीर्थ के जल में विलीन शिवजी के रूप में प्रकट है। यह तीर्थ गंगा स्नान् से भी पुण्यकारी माना जाता है,इस तीर्थ में बाइस कूप रूपी भाग में गंगा यमुना गया शिव पार्वती सूर्य चन्द्र कोटि तीर्थ अपने आप आकर शामिल हो गये है। स्वयं लक्ष्मी जी तीर्थ का रूप धारण करने के बाद जल रूप में विद्यमान है। इस तीर्थ में स्नान करने का मंत्र है-
रामेश्वर तीर्थे विष्णु जले करोमि स्नानमय वै। पितृणां विष्णुलोकाय भुक्ति मुक्ति प्रसिद्धये॥
अर्थात- भगवान विष्णु ही जिसके जल है,उस रामेश्वरम तीर्थ में मैं स्नान करता हूँ,इसका उद्देश्य यह है कि पितरों को शिवलोक के माध्यम से विष्णुलोक की और मुझे भोग और मोक्ष की प्राप्ति हो।
रामेश्वर तीर्थ में स्नान करके मनुष्य अपने गृहसूत्र के अनुसार तपण और श्राद्ध करे। तत्पश्चात शिवलिंग रूप में स्थित ब्रह्माजी को नमस्कार करे -
नम: शिवाय देवाय ईशानपुरुषस्य च। अघोरवाम देवाय सद्योजाताय शम्भवे॥
अर्थात- ईशान तत्पुरुष अघोर वामदेव तथा सद्योजात इन पांच नामों से प्रसिद्ध कल्याणमय भगवान शिव को नमस्कार है।
इस मंत्र से पितामह को नमस्कार करके उनकी पूजा करनी चाहिये,रामेश्वरम तीर्थ में स्नान करके यदि मनुष्य भगवान शिव और गदाधर का दर्शन और उनको नमस्कार करे तो वह पितरों सहित अपने आपको बैकुण्ड धाम को ले जाता है। भगवान गदाधर को नमस्कार करते समय यह मंत्र कहना चाहिये-
ऊँ नमो वासुदेवाय नम: संकर्षणाय च। प्रद्युम्नायानिरुद्धाय श्रीधराय च विष्णवे॥
अर्थात- वासुदेव संकर्षण प्रद्युम्न तथा अनिरुद्ध इन चार ब्यूहों वाले सर्वव्यापी भगवान श्रीधर को नमस्कार है।

उपरोक्त पांचो तीर्थों के स्नान करने के बाद मनुष्य अपने पूर्वजों को ब्रह्मलोक में पहुंचाने का कार्य करता है। जिस भावना से व्यक्ति के माता पिता और पूर्वज मनुष्य की पालना करते है उसे सभी सुखों से पूर्ण करते है,उस भावना को पूरा करने में मनुष्य इन्ही तीर्थों में स्नान करने के बाद पूर्वजों की भावना का उद्धार करता है,यही मुख्य काम पितृ ऋण को चुकाने के नाम से जाना जाता है।

पितृ तर्पण और पिंडदान में प्रयोग की जाने वाली वस्तुयें

  • तिल
  • नारियल कच्चा या सूखा
  • सत्तू या पके चावल जिनके अन्दर घी डाला गया हो.
  • कुश
  • केले के पत्ते या पत्ते से बने दौने
  • हल्दी
  • कुम कुम
  • कच्चे चावल
  • तांबे का लोटा
  • फ़ूल लाल और पीले
  • फ़ूल माला लाल और पीली
  • स्वर्ण धातु
  • चांदी के पत्तर
  • बारह अमावस का भोजन संकल्प पुरुष के लिये नर और स्त्री के लिये मादा ब्राह्मण
  • वस्त्रदान

(पितृ तर्पण या पिंडदान के लिये अन्य किसी जानकारी के लिये सम्पर्क करें.)
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