मंत्रात्मक सप्तशती श्लोक -३

श्लोक ३

विनियोग:

ऊँ अस्य श्री ’महा-मायाऽनुभावेन’ इति सप्तशती तृतीय मन्त्रस्य श्रीमार्कण्डेय ऋषि: भगवान श्रीसूर्य नारायणो देवता,क्लीं बीजं,ज्योति: शक्ति, छिन्नमस्ता महा विद्या रजो गुण: श्रोत्रं ज्ञानेन्द्रियं शान्त रस:,वाक कर्मेन्द्रियं,प्रश्नं स्वरं,भू तत्वं विद्या कला,ह्रीं उत्कीलनं,संकोचिनी मुद्रा मम क्षेम स्थैर्यायुरारोग्याभिवृद्धयर्थं श्रीजगदम्बा योगमाया भगवती दुर्गा प्रसाद सिद्धयर्थं च नमो युत प्रणव बाग्बीज स्व बीज लोम विलोम पुटितोक्त तृतीय मन्त्र जपे विनियोग:।

ऋष्यादि न्यास:

श्रीमार्कण्डेय ऋषये नम: सहस्त्रारे शिरसि,भगवान श्रीसूर्य नारायण देवतायै नम: द्वादसारे ह्रदि,क्लीं बीजाय नम: षडारे लिंगे,ज्योति शक्तयै नम: दशारे नाभौ,छिन्नमस्ता महाविद्यायै नम: षोडशारे कण्ठे रजो गुनाय नम: अन्तरारे मनसि,श्रोत्र ज्ञानेन्द्रियाय नम: ज्ञानेन्द्रिये,शान्त रसाय नम: चेतसि,वाक कर्मेन्द्रियाय नम: कर्मेन्द्रिये,प्रश्न स्वराय नम: कण्ठमूले,भूतत्वाय नम: चतुरारे गुदे,विद्या कलायै नम: करतलै,ह्रीं उत्कीलनाय नम: पादयो:,संकोचिनी मुद्रायै नम: सर्वांगे,मम क्षेम स्थैर्यायुरारोग्याभिवृद्धयर्थं श्रीजगदम्बा योगमाया भगवती दुर्गा प्रसाद सिद्धयर्थ च नमो युत प्रणव वाग्बीज स्वबीज लोम विलोम पुटितोक्त तृतीय मन्त्र जपे विनियोगाय नम: अंजली।

मंत्र कर-न्यास: षडंग न्यास:
ऊँ ऐं क्लीं अंगुष्ठाभ्याम नम: ह्रदयाय नम:
ऊँ नमो नम: तर्जनीभ्याम स्वाहा शिरसे स्वाहा
महा-मायाऽनुभावेन मध्यमाभ्याम वषट शिखायै वषट
यथा मन्वन्तराधिप: अनामिकाभ्याम हुम कवचायहुम
स बभूव महा-भाग: कनिष्ठिकाभ्याम वौषट नेत्र त्राय वौषट
सावर्णिस्तनयो रवे: करतल कर पृष्ठाभ्याम फ़ट अस्त्राय फ़ट

ध्यान

भास्वद रत्नाढ्य मौलि: स्फ़ुरदधर रुचा रंजितश्चारु केशो,
भास्वान्यो दिव्य तेजा: कर कमल युत: स्वर्ण वर्ण: प्रभामि:।
विश्वाकाशावकाशो ग्रह गण सहितो भाति यश्चोदयाद्रौ,
सर्वानन्द प्रदाता हरिं हर नमित: पातु मां विश्व चक्षु:॥

मन्त्र

ऊँ ऐं क्लीं नम: महा-मायाऽनुभावेन,यथा मन्वन्तराधिप:।
स बभूव महा-भाग:,सावर्णिस्तनयो रवे: नमो क्लीं ऐं ऊँ॥

१००० मंत्र जाप करने से सिद्ध होगा तथा शक्कर तिल घी के दशांश से हवन करना होता है।

मंत्रात्मक सप्तशती ७०० श्लोक

Unless otherwise stated, the content of this page is licensed under Creative Commons Attribution-ShareAlike 3.0 License