श्लोक २

विनियोग

ऊँ अस्य श्री ’सावर्णि: सूर्य तनयो’ इति सप्तशती द्वितीय मन्त्रस्य श्रीमार्कण्डेय ऋषि: भगवान श्री सूर्यनारायणो देवता,ह्रीं बीजं ज्योति शक्ति:,छिन्नमस्ता महाविद्या,रजोगुण:,श्रोत्र ज्ञानेन्द्रियं,शान्तं रस:,वाक कर्मेन्द्रियं,प्रश्न स्वरं,भू तत्वं विद्या कला,ह्रीं उत्कीलनं,संकोचिनी मुद्रा,मम क्षेंम स्थैर्यायुरारोग्याभिवृद्धयर्थ श्रीजगदम्बा योगमाया भगवती दुर्गा प्रसाद सिद्धयर्थं च नमो युत प्रणव वाग्वीज स्व बीज लोम विलोम पुटितोक्त द्वितीय मन्त्र जपे विनियोग:।

ऋष्यादि-न्यास:

श्रीमार्कण्डेय ऋषये नम: सहस्त्रारे शिरसि,भगवान श्री सूर्य नारायण देवतायै नम: द्वादशारे ह्रदि,ह्रीं बीजाय नम: षडारे लिंगे,ज्योति शक्तयै नम: दशारे नाभौ,छिन्नमस्ता महाविद्यायै नम: षोडशारे कण्ठे,रजोगुणाय नमं अन्तरारे मनसि, श्रोत्र ज्ञानेन्द्रियाय नम: ज्ञानेन्द्रिये,शान्त रसाय नम: चेतसि,वाक कर्मेन्द्रियाय नम: कर्मेन्द्रिये,प्रश्न स्वराय नम: कण्ठमूले,भू-तत्वाय नम: चतुरारे गुदे,विद्या कलायै नम: करतले,ह्रीं उत्कीलनाय नम: पादयो:,संकोचिनी मुद्रायै नम: सर्वांगे,मम क्षेंम स्थैर्यायुरारोग्याभिवृद्धयर्थ श्रीजगदम्बा योगमाया भगवती दुर्गा प्रसाद सिद्धयर्थं च नमो युत प्रणव वाग्वीज स्व बीज लोम विलोम पुटितोक्त द्वितीय मन्त्र जपे विनियोगाय नम: अंजली।

मंत्र करन्यास: षडंगन्यास:
ऊँ ऐं ह्रीं अंगुष्ठाभ्याम नम: ह्रदयाय नम:
ऊँ नमो नम: तर्जनीभ्याम स्वाहा शिरसे स्वाहा
सावर्णि: सूर्य तनयो मध्यमाभ्याम वषट शिखायै वषट
यो मनु: कथ्यतेऽष्टम: अनामिकाभ्याम हुम कवचाय हुम
निशामय तदुत्पतिं कनिष्ठकाभ्याम वौषट नेत्र त्राय वौषट
विस्तराद गदतो मम करतल कर पृष्ठाभ्याम फ़ट अस्त्राय फ़ट

ध्यानं

भास्वद रत्नाढ्य मौलि: स्फ़ुरधर रुचा रंजितश्चारु केशो,
भास्वान्यो दिव्य तेजा: कर कमल युत: स्वर्ण वर्ण: प्रभाभि:।
विश्वाकाशावकाशो ग्रह गण सहितो भाति यश्चोदयाद्रौ,
सर्वानन्द प्रदातां हरि हर नमित: पातु मां विश्व चक्षु:॥

जाप मंत्र

ऊँ ऐं ह्रीं नम: सावर्णि: सूर्य तनयो,यो मनु:कथ्यतेऽष्टम:।निशामय तदुपत्तिं,विस्तराद गदतो मम नमो ह्रीं ऐं ऊँ
(१००० जाप,शक्कर तिल घी से दशांश हवन).

सप्तशती के ७०० श्लोक

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