मंत्रात्मक सप्तशती श्लोक १

ऊँ ह्रीं श्रीसरस्वत्यै नम:। श्री गणेशाय नम:। श्री आदि-नाथाय नम:।

प्रथम चरित (मधु-कैटभ-वध:)

प्रथम अध्याय

श्लोक - १

विनियोग

ऊँ अस्य श्री मार्कण्डेय उवाच इति सप्तशती प्रथम मन्त्रस्य श्रीमहर्षि वेदव्यास ऋषि: भगवान सदाशिव: देवता श्रीं बीजं जगद्धात्री शक्ति: भुवनेश्वरी महा विद्या रजो गुण: रसना ज्ञानेन्द्रियं वैराग्यो रस: वाक कर्मेन्द्रियं मध्यम स्वरं भू तत्वं विद्या कला ब्रूं उत्कीलनं प्रवाहिनी मुद्रा मम क्षेम स्थैर्यायुरारोग्यामिवृद्धयर्थ श्री जगदम्बा योगमाया भगवरी प्रसाद सिद्धयर्थ च नमो युत प्रणव वाग्वीज स्व बीज लोम विलोम पुटितोक्त प्रथम मन्त्र जपे विनियोग:।

ऋष्यादि-न्यास

श्रीवेदव्यास ऋषये नम: सहस्त्रारे शिरसि,भगवान श्रीसदाशिव देवाय नम: द्वादशारे ह्रदि,श्रीं बीजाय नम: षडारे लिंगे,जगद्धात्री शक्तयै नम: दशारे नाभौ,भुवनेश्वरी महा विद्यायै नम: षोडशारे कण्ठे,रजो गुणाय नम: अन्तरारे मनसि,रसना ज्ञानेन्द्रियाय नम: ज्ञानेन्द्रिये,वैराग्य रसाय नम: चेतसि,वाक कर्मेन्द्रियाय नम: कर्मेन्द्रिये,मध्यम स्वराय नम: कण्ठमूले,भू-तत्वाय नम: चतुरारे गुदे,विद्यां कलायै नम: कर तले,ब्रूं उत्कीलनाय नम: पादयो:,प्रवाहिनी मुद्रायै नम: सर्वांगे,मम क्षेम स्थैर्यायुरारोग्याभिवृद्धयर्थं श्री जगदम्बा योगमाया भगवती दुर्गा प्रसाद सिद्धयर्थं च नमो युत प्रणव वाग्वीज स्वबीज लोम विलोम पुटितोक्त प्रथम मन्त्र जपे विनियोगाय नम: अंजली।

मंत्र करन्यास: षडंग न्यास:
ऊँ नमो अंगुष्ठाभ्याम नम: ह्रदयाय नम:
ऐं नमो तर्जनीभ्याम स्वाहा शिरसे स्वाहा
श्रीं नमो मध्यमाभ्याम वषट शिखायै वषट
नमो नम: अनामिकाभ्याम हुम कवचाय हुम
ऊँ ऐं श्रीं नम: कनिष्ठकाभ्याम वौषट नेत्रत्राय वौषट
मार्कन्डेय उवाच करतल कर पृष्ठाभ्याम फ़ट अस्त्राय फ़ट

ध्यानं

ध्यायेन्नित्यं महेशं रजत गिरि निभं चारु चन्द्रावतंसम।
रत्नाकल्पोंज्वलांगं परशु मृग वराभीति हस्तं प्रसन्नम॥
पद्मासीनं समन्तात स्तुतममर गणैव्यार्घ्र कृतिं वसानम।
विश्ववाद्यमं विश्व वन्द्यं निखिल भय हरं पंच वक्त्रं त्रिनेत्रम॥

जाप मंत्र

ऊँ ऐं श्रीं नम: मार्कण्डेय उवाच नमो श्रीं ऐं ऊँ
(१००० जाप से सिद्धि,गुड तेल घी से दशांश का हवन)

सप्तशती के ७०० श्लोक

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