ज्योतिषीय तरीके से कुण्डली व्याख्या

जीवन चरित्र को सम्पादित करने के लिये भारतीय वैदिक ज्योतिष के सहारे से जो फ़ल प्रतिपादित किये जाते है वे अपने आप में अनूठे है.कुण्डली एक गाथा है जो जीवन के हर भाग को अपने आप बताती चली जाती है,भावानुसार और ग्रहानुसार जो फ़ल मिलते है और जातक की मनोस्थिति क्या है कुण्डली के द्वारा पता की जा सकती है,मैने अपने पिछले पच्चीस साल से जो सीखा है और लोगों को बताया है उसी के अनुसार कुण्डली किस प्रकार से व्याखातित की जा सकती है कुछ नियम मैने अपने आप से प्रतिपादित किये है,किसी भी ज्ञान को अगर प्राप्त किया जाये और वह किसी भी प्रकार से जन सामन्य के काम आये तो वह ज्ञान सफ़ल माना जायेगा,और जो लोग ज्ञान को प्राप्त करने के बाद भी अपने को गूध रखते है और बताने से पीछे मात्र इसलिये जाते कि कोई उनका ज्ञान जान कर उनका बुरा न कर दे या वह किसी भी प्रकार से उनके ज्ञान के द्वारा अपने को धनी न बना ले या उस ज्ञान को बताने पर उसकी प्रतिभा पर कोई आंच आये तो यह सब गलत बात मै इसलिये मानता हूँ कि विद्या धन सभी धनों मे श्रेष्ठ बताया गया है,और इसको जितना खर्च करो उतना ही फ़ायदा देता है,मानव शरीर केवल दूसरोम के लिये ही मिला है अपने लिये तो केवल ईश्वर भजन है अगर वह भी दूसरों के हित मे नही कर पाया तो भी कोई बात नही,लेकिन अगर किसी भी प्रकार से भावना में अहम आ गया तो जो जिसको मिलना है वह नही मिल पायेगा,और नही मिल पायेगा तो पाप का भागी बनना पडेगा,इसलिएय जो भी ज्ञान किसी भी प्रकार से मिला है वह संसार के आगे फ़ेंक देने से लोगों का मानस भी उसी ज्ञान को और निथारने मे लगेगा,और किसी दिन वह प्रतिपादित किया गया ज्ञान भी स्वच्छ और निर्मल होकर मानव समुदाय का भला ही करेगा.

कुण्डली का समय ज्ञान

जब जातक पैदा होता है तो नर्सिंग होम या घर में जन्म समय को याद रखा जाता है,जब किसी के बारे मे पता करना होता है,तो सबसे पहले जन्म समय और स्थान के द्वारा आसमानी ग्रहों का स्थान देखना पडता है,प्रत्येक आसमानी ग्रह अपनी अपनी ताकत को कुण्डली में चारो पुरुषार्थों के बारे मे व्यक्त करता है,जीवन के जो चार पुरुषार्थ है वे-धर्म,अर्थ,काम और मोक्ष के नाम से जाने जाते है,कुन्डली के बारह भावों को इन्ही चार पुरुषार्थों के प्रयोगानुसार विभाजित किया गया है,पहला,पांचवां,और नवां भाव धर्म का भाव माना जाता है,दूसरा छठा और दसवां भाव अर्थ का माना जाता है,तीसरा,सातवां और ग्यारहवां भाव काम का माना जाता है,और चौथा,आठवां और बारहवां भाव मोक्ष का माना जाता है.पुरुष की कुण्डली को व्याख्यात्मक रूप में सामने लाने के लिये गुरु (बृहस्पति) को लगन मानकर सामने किया जाता है,तथा स्त्री की कुण्डली के अन्दर शुक्र को लगन मानकर प्रयोगात्मक रूप मे लाया जाता है.जन्म समय को प्रकाशित करने की कला है कि दशा और अन्तरदशा का विच्छेदन करना,घटना का प्रकाशन दशा और अन्तर्दशा से किया जाता है,जन्म के समय का हाल जानने के बाद ही पुरातन विद्वान अपना मत सही जन्म समय के लिये मत प्रकाशित करने के प्रति सजग रहा करते थे,कुण्डली के अनुसार पता चलता था,कि जातक के जन्म के समय अमुक संख्या में स्त्री या पुरुष प्रसूता के पास उपस्थित थीं,जातक के समय पिता का स्थान बताया जाता था,कि वह बाहर था या घर मे उपस्थित था,जातक के पहले भाई या बहिनो की संख्या,जातक के पिता के भाई या बहिनो की संख्या का ज्ञान पता करने के बाद ही जातक का जीवन-पत्र बनाया जाता था,युवावस्था में व्यक्ति के बारे मे बताने के लिये कुण्डली का सर्वप्रथम संशोधन किया जाता था,किसी भी सामयिक घटना को पता करने के बाद ही और उस घटना से सम्बन्धित अन्तर्दशा और प्रत्यन्तर दशा के द्वारा ही पता किया जाता था.छ: बार पलक झपकाने के समय के अनुसार ही एक दिन का समय आगे या पीछे किया जाता था,और इस प्रकार से कुण्डली को संशोधित करने के बाद ही जन्म वृतांत सुनाया जाता था,तभी से ज्योतिष की महत्ता संपूर्ण संसार में व्याप्त होती चली गयी.

धर्म का काम और अर्थ का मोक्ष विरोधी है

कुण्डली में जातक को धर्म के रूप में प्रस्तुत किया जाता है और विरोध में काम को स्थापित किया जाता है,जातक की दैनिक से लेकर महिना और वर्षॊं के क्रिया कलाप को अर्थ से जोडा जाता था,जब सभी क्रियायें पूर्णता की ओर जाती थीं,तभी जातक को मोक्ष यानी शांति के लिये संदेश दिया जाता था.संसार का प्रत्येक प्राणी कुछ अपना काम करने के लिये ही इस संसार मे आया है,और इस शरीर का कार्य उसी प्रकार से जिस प्रकार से किसी पेकिंग मे रखे सामान में पेकिंग का,सामान को प्रयोग करने के बाद पेकिंग को किसी रद्दी स्थान पर ही फ़ेंका जाता है,सीधे तरीके से समझने के लिये भारत में लस्सी के लिये प्रयुक्त कुल्हड को ही ले लीजिये,हलवाई कुल्हड मे लस्सी को देता है,और उस कुल्हड को तभी तक संभाला जाता है,जब तक कि उसमे लस्सी विद्यमान है,जैसे ही लस्सी को पीकर समाप्त किया जाता है,कुल्हड को किसी गन्दी जगह पर फ़ेंक दिया जाता है,और दुबारा से लस्सी को पीने के लिये दूसरे कुल्हड का प्रयोग ही किया जाता है,उसी प्रकार से इस शरीर का उपयोग जब तक दूसरे लोग करते हैं,जबतक कि इसमें कुछ जान है और वह जान यानी जीव किसी काम का है,जैसे ही वह शरीर किसी काम का नही रहता,इस शरीर को जीव त्याग देता है,इसी बात को समझ कर अपने शरीर में व्याप्त ज्ञान और कर्म का प्रभाव हर आदमी को समझना चाहिये.धर्म का विरोधी काम है यह तो अटल सत्य है,शरीर का इस संसार मे तभी तक मान है जब तक कि वह काम के वशीभूत है,काम का अर्थ पति या पत्नी,और पति या पत्नी से उत्पन्न संतान,इनके प्रति काम ही मोह पैदा करता है,मोह से इस संसार के काम मे हर मनुष्य चिपका हुआ है,और इसी चिपकन के कारण वह जिसे अपना समझता है,वह केवल इसी अभिलाषा से चिपका है जैसे कि लस्सी रहने तक कुल्हड से चिपका जाता है,जैसे ही लस्सी को पूरा पिया और कुल्हड रूपी इस शरीर को सबसे खराब जगह,जहां पर आदमी या तो जलाये जाते हैं या दफ़नाये जाते है,वहीं पटक दिया जाता है या जला दिया जाता है,यही सत्य है इसके अलावा और सब मोह या अभिलाषा का कारण भी मुख्य माना जाता है,काम ही अभिलाषा है,और जब तक अभिलाषा शरीर मे है,काम जागृत रहता है,उसी प्रकार से अर्थ का विरोधी मोक्ष है,मनुष्य जबतक धन के चक्कर मे है,सम्पदा के चक्कर मे है,तब तक वह मोक्ष यानी शांति को प्राप्त नही कर सकता है,मोक्ष को प्राप्त करना है तो अर्थ का परित्याग करना,या इतना अर्थ प्राप्त कर लेना कि आगे कभी प्राप्त करने के लिये जद्दोजहद ही न करनी पडे,यह सब प्रकृति के ऊपर निर्भर है,कितना ही मनुष्य प्रयास करे,लेकिन जबतक देने वाला नही आता,तब तक प्राप्त नही हो सकता है,और जब तक प्राप्त नही होता तब तक तो मानसिक और शारीरिक अशांति ही मानी जायेगी.

गुरु जीव और सूर्य आत्मा

आपके सामने एक जन्म तारीख और समय है,तारीख ११ नबम्बर सन १९७४,जन्म समय रात के ११ बजकर ५० मिनट,और जन्म स्थान जबलपुर,मध्यप्रदेश,भारत है.लहरी पद्धति से गणना करने पर जो जन्म-पत्र बनता है,वह इस प्रकार से है,कर्क लगन है,चन्द्र,प्लूटो लगन से तीसरे,यूरेनस,बुध,मंगल,सूर्य,शुक्र चौथे भाव में,पांचवें मे नेप्च्यून और राहु,आठवें भाव में गुरु,ग्यारहवें भाव में केतु और बारहवें भाव में बक्री शनि विराजमान है,मैने पाले कहा है कि गुरु जीव का कारक है,अभी यह तय नही करना है,कि अमुक का लिंग क्या है,वह स्त्री है या पुरुष,पहले जीव का स्थान देखना है,कि वह किस स्थान से सूर्य यानी आत्मा को जागृत करने की आकांक्षा रखता है,गुरु आठवें भाव मे है,यह भाव अक्सर जिन कारकों के प्रति प्रयोग किया जाता है,वे सब मृत्यु से जुडी होती है,मौत केवल शरीर का खात्मा ही नही होती,मौत के प्रकार भी अलग अलग कहे गये है.

एक सौ एक प्रकार की होती है मौत

ऋग्वेद (७.७९.१२) और पारवर्ती साहित्य में मृत्यु को भयसूचक कहा गया है,एक सौ एक प्रकार की मृत्यु कही गयी है,जिनमे वृद्धावस्था की स्वाभाविक के सिवाय मृत्यु के एक सौ प्रकार है,पूरे वैदिक साहित्य में जीवन काल एक सौ वर्षॊं का वर्णित है,वृद्धावस्थासे पहले मरण (पुरा जरस:) निश्चित जीवन काल के पहले मरने (सुरा आयुष:) के समान माना जाता था,दूसरी तरफ़ वृद्धावस्था में ह्सक्ति क्षीण हो जाने पर बुराई का अनुभव किया जाता था,(ऋग्वेद १.७१.१०.,और १.७९.१),अश्विनी कुमारों के चमत्कारो से एक वृद्ध च्यवन ऋषि को पुन: नवयुवक तथा शक्तिशाली बनाने की क्रिया को वृद्धावस्था के अपमान से बचाकर पुनर्जीवित करना कहा गया है,(अथर्ववेद) में आयुष्य प्राप्ति तथा मृत्यु से मुक्ति के अनेक मन्त्र है,मगर हर मन्त्र एक सौ मृत्यों के प्रति ही है,शव को गाडने और जलाने दोनो प्रकार की प्रथाओं का वर्णन मिलता है,किन्तु गाडना कम पसन्द किया जाता था,प्राय: शव की दाह क्रिया होती थी,मृत्यु के बाद पुन: जीवन चक्र के बारे में भी बखान मिलते है,(ऋग्वेद) मे कहा गया है कि बुरे कार्य करने वालों के लिये बुराइयां इन्तजार करती है,लेकिन (अथर्वेद) के समय से ब्राह्मणो ने नरक की कल्पना प्रतिपादित करदी थी,ब्राह्मण ग्रन्थ ही (शत.ब्रा.११.६.१ और जै.ब्रा.१.४२-४४) सबसे पहले अच्छे या बुरे कार्यों का परिणाम स्वर्ग या नरक के रूप में बताते है.उपरोक्त जन्म तारीख के अनुसार गुरु ८वें भाव में कुम्भ राशि मे है,कुम्भ राशि शनि की राशि है,और कालपुरुष के अनुसार धर्म के विरोधी भाव में स्थापित है,लेकिन इस धर्म के विरोधी भाव का स्थान भी वास्तव में जन्म समय के अनुसार किस भाव में है,यह भी जानना जरूरी है,वर्ना किसी का इतिहास जाने बिना फ़ल कथन किस प्रकार किया जा सकता है,कालपुरुष का ८ वां भाव वृश्चिक राशि है,वृश्चिक राशि भारतीय साहित्य से मंगल का घर और पाश्चात्य साहित्य से प्लूटो का घर मानी गयी है,मंगल के घर में या प्लूटो के घर में कुम्भ राशि ने जिसका मालिक भारतीय साहित्य से शनि और पाश्चात्य साहित्य से यूरेनस मालिक है,ने अपना घर बनाया,और वहां पर जीव की प्राप्ति हुई,अब सबसे पहले यह पता करना है,कि जिसे जीव की प्राप्ति हुई वह कौन था ? साधारण भाषा मे समझने के लिये अनुमान लगा लिया जाता है,कि जीव की प्राथमिक पालना तो माता को करनी पडती है,और माता से जातक का आठवां भाव ही पांचवां भाव कहा जाता है,पांचवा भाव जिस क्षेत्र में कहा जाता है,वह है मंगल के घर में जो कि शमशानी स्थान था,उस शमशानी स्थान पर कुम्भ राशि जो कि शनि का घर मानी जाती है,और कालपुरुष के अनुसार किये गये कार्य की प्राप्ति का स्थान माना जाता है,ने अपना घर बनाया,मतलब सीधा सा सामने आता है कि एक व्यवसायिक अस्पताल,जो कि मंगल का घर है,जहां पर शरीर की किसी भी प्रकार मृत्यु को देकर जीवन प्राप्त किया जाता हो,यानी आपरेशन-थियेटर,जिसमे पहले शरीर को बेहोशी की दवा के द्वारा चेतना शून्य कर दिया जाता है,फ़िर आपरेशन के द्वारा शरीर से शरीर को प्राप्त किया जाता है,इस प्रकार से एक ही शब्द से पता चला कि जातक का जन्म एक प्राइवेट नर्सिंग होम मे हुआ था.

जीव को आत्मा की प्राप्ति सूर्य के द्वारा मिलती है

किसी भी विद्या को प्राप्त करने के लिये आध्यात्मिक और भौतिक दोनो का जानना जरूरी है,(ईशोपनिषद) में कहा गया है-"विद्यान्च अविद्यान्च यस्तद वेद उभयं सह,अविद्या मृत्युं तीर्त्वा विद्ययाऽमृतमश्नुते",अर्थात- जो विद्या (आध्यात्म) और अविद्या (भौतिक शास्त्र) को साथ साथ जानता है,वह अविद्या से मृत्यु-संसार को पारकर विद्या से अमरत्व को प्राप्त करता है,प्रसिद्ध विद्वान (नागेश भट्ट) ने इसी आधार पर विद्या का अर्थ प्रयोग किया है,"परमोत्तमपुरुषार्थसाधनीभूता विद्या ब्रह्मज्ञानस्वरूपा",इस जन्म-पत्र में गुरु से सूर्य काम के साथ जुडा हुआ है,लेकिन गुरु का पहला मिलन शनि से होता है,जो कि बक्री है,और पलट कर केतु को देख रहा है,यहां पर केतु पिता के घर से दूसरे भाव में बिराजमान है,और माता के घर से ८ वें भाव में विराजमान है,केतु साधन का स्वरूप है,और वृषभ राशि का केतु भौतिक साधन के रूप में जाना जाता है,नगद धन भी भौतिक साधन है,केतु के साथ चन्द्रमा कन्या का है,कन्या का चन्द्रमा नर्स के रूप में मानते है,जो कि कुण्डली के लगन भाव से तीसरे स्थान पर विराजमान है,पराक्रम का सहायक है,जातक को एक नर्स की सहायता से उस किराये के कमरे मे लाया गया जहां पर सूर्य,यानी आत्मा (प्रकाश) जो कि यूरेनस (बिजली का तार),बुध (गोल लट्टू का कवर),मंगल (बिजली से चलाया जाने वाला) सूर्य (बिजली का प्रकाशित बल्ब) के नीचे लाने पर संसार के द्वारा आत्मा की पहिचान की गयी कि यह शुक्र (स्त्री जातक) है.यह भौतिक कथा है और इसके बाद जब जीव की उपस्थिति को पता करते है,तो पता चलता है,कि यूरेनस (टेलीफ़ोन) से बुध (संदेश) दिया गया,पहले मंगल (पिता से सातवां मन्गल छोटा भाई) को फ़िर सूर्य (पिता) को और सभी विभिन्न समय के अन्तर मे अस्पताल में उपस्थित हो गये,लेकिन जातिका (शुक्र) मन्गल और राहु के बीच मे होने से पापकर्तरी योग में फ़ंसी थी,उसे जीवन दान भी नेप्च्यून (परात्मा) जो कि वह भी राहु के साथ अगले घर मे उपस्थित थी ने दिया.

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