केतु फ़ल (दूसरा भाग)
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केतु का दूसरा नाम सहारा देने वाले साधनों के रूप में जाना जाता है। बिना सहारे के बच्चा भी जन्म के बाद खडा नही हो सकता है,और जीवन उसके हाथ पैर शरीर के विभिन्न अंग सहारे के रूप में काम करते है। केतु की सीमा उसी प्रकार से अनन्त है जैसे कि राहु की सीमा,अन्य किसी ग्रह की सीमा को आराम से वर्णित किया जा सकता है लेकिन राहु केतु की सीमा को वर्णन नही किया जा सकता है। यह दोनो ही छाया ग्रह है और दोनो प्रकार की शक्तियों के रूप में काम करती है,दो प्रकार की शक्तियों में केतु नकारात्मक है लेकिन दिखाई देता है,राहु सकारात्मक है लेकिन दिखाई नही देता है। इस चित्र में आप देख रहे है कि पानी के अन्दर से दो कमल नाल निकले है और दोनो पर ब्रह्मा और विष्णु विराजमान है,यह दोनो सकारात्मक रूप के रूप में जाने जाते है ब्रह्मा का काम निर्माण करना है और विष्णु का काम ब्रह्मा के द्वारा निर्मित सृष्टि का पालन करना है,लेकिन आप देख रहे होंगे कि भगवान शिव शेर पर लेटे है,और उनकी नाभि से जो कमल नाल निकली है,और बडा सा कमल का फ़ूल है,उस फ़ूल पर पंचमुखी तथा दसभुजाओं को धारण करने वाली शक्ति कामाख्या देवी विराजमान है,यह शक्ति किसी भी जीव की सकारात्मक प्रवृत्ति को अवशोषित करने के बाद एक नये निर्माण का विकास करने के लिये जानी जाती है। संहार का ही दूसरा नाम नया निर्माण है,यह सब आप गीता में पढ सकते है,कि आत्मा पुराने शरीर को त्याग कर नये शरीर को धारण उसी प्रकार से करती है जैसे एक मनुष्य पुराने वस्त्र को त्याग कर नये वस्त्र को धारण करता है। माता कामाख्या को लगन के केतु के रूप में मान्यता दी जाती है,जैसे गुरु और मंगल का साथ अगर बारहवें भाव में है तो माँ तारा का रूप मिलता है उसी प्रकार से लगन के केतु के लिये माता कामाख्या को जाना जाता है। संसार का कोई भी जीव बिना उसी प्रकार के जीव के अपनी नयी देह को नही धारण कर सकता है,एक ही प्रकार के जीव के अन्दर दोनो प्रकार के जीव एक सकारात्मक और नकारात्मक का भी होना जरूरी है। जैसे पुरुष सकारात्मक है और स्त्री नकारात्मक है। स्त्री का काम एक तरफ़ पुरुष की सकारात्मकता को बढाने का है और दूसरी तरफ़ मैथुन के द्वारा उस सकारात्मकता को अपने गर्भ में स्थापित करने के बाद नये जीव के निर्माण करने का है। मतलब एक तरफ़ तो वह अपने पति को विभिन्न प्रकार के भोजन फ़ल और अन्य साध्य साधनों के द्वारा पोषित करती है तो दूसरी तरफ़ अपने मैथुन के दौरान उस वीर्य नामक पके हुये पोषित रस को ग्रहण कर लेती है। जो शरीर माता के द्वारा पैदा किया जाता है वह नये रूप में होता है माता उस शरीर को पालने पोषने में कोई कोताही नही करती,तो स्त्री रूप में उस पाले हुये शरीर का अवशोषण करने के बाद नयी शक्ति को पैदा करने से माना जाता है। यह क्रम लगातार चलता रहता है। शरीर की निर्माण प्रक्रिया को पूरा करने के लिये नकारात्मक और सकारात्मक दोनो रूपों का होना अति आवश्यक होता है,चाहे वह शरीर मनुष्य रूप में हो या जानवर या कीट पतंग पक्षी वृक्ष किसी भी रूप में हो,नकारात्मक और सकारात्मक रूप होने अति आवश्यक है। योनि रूप में माता कामाख्या और लिंग रूप में भगवान शिव को पूजा जाता है,यह दोनो रूप ही संसार की उत्पत्ति और विनाश के कारक माने जाते है। लगन के केतु के लिये अक्सर लोगों के अन्दर भ्रान्ति रहती है,कि यह केतु केवल सहायक के रूप में ही पैदा हुआ है और जीवन में तरक्की नही कर सकता है। लेकिन यह सोच कतई गलत है,संसार का हर जीव जन्तु वृक्ष आदि सभी के लिये किसी न किसी प्रकार की सहायता के लिये ही पैदा हुये है। प्रकृति के संतुलन के लिये जहाँ सकारात्मकता अधिक पैदा हो जाती है वहाँ प्रकृति पहले से ही नकारात्मकता को पैदा करने के लिये नकारात्मकता को तैयार रखती है। जैसे एक वन में अगर सौ हिरण उसने पैदा केवल इसलिये किये है कि वे घास पात और वृक्षों को खाकर उनकी संख्या को प्रकृति के अनुपात के हिसाब से संयत रखें,तो वे हिरण जो सौ से अधिक नही हो जावें,इसलिये दस शेर या हिरणों को मारने वाले जीव भी पैदा कर दिये है। जो जीव बहुत ही सशक्त है उनके लिये बुद्धिजीवी जीव पैदा कर दिये है जैसे कि मनुष्य। मनुष्य के संतुलन के लिये भी प्रकृति अपने अपने समय पर कोई ना कोई विनाश लीला उसी की गल्तियों से प्रस्तुत कर देती है। इसके अलावा भी मनुष्य मनुष्य को ही मारने और अधिक संख्या में नही होने के प्रति उसके अन्दर प्रकृति एक प्रकार का दुर्भावना रूपी बीज बो देती है,जैसे भाई भाई तो आराम से रह सकते है लेकिन उनकी पत्नियां आपस में बैर भाव और दुर्भावना से एक दूसरे को साथ साथ नही रहने देतीं,अथवा उन दोनो के अन्दर उन आवश्यकताओं को पैदा कर देती है कि वे हार कर अलग अलग हो जाते है। कोई किसी को धर्म से मार देता है कोई किसी को समाज से मार देता है कोई देश के नाम से कोई जाति के नाम से कोई राजनीति के नाम से यह प्रत्यक्ष रूप से मारक रूप नही होकर अप्रत्यक्ष रूप से मारक शक्तियां सर्व शक्तिमान मनुष्य के अन्दर भी प्रकृति ने दी है। सहायक के रूप में लगन का केतु पांच प्रकार से नकारात्मकता भरता है,और उसी अनुपात में लगन से सप्तम का राहु खाली जगह को भरने का काम करता है,और सकारात्मक बल देता है। जैसे लगन का केतु तीसरी नजर से तीसरे भाव को देखता है और जातक के अन्दर अपनी लिखने की कला को या चित्रकारी की कला को देता है कलम और पेपर देता है कम्पयूटर देता है की बोर्ड को देता है तो सप्तम का राहु चित्रकारी को करने के लिये दिमाग को पैदा करता है कम्पयूटर के अन्दर सोफ़्टवेयर के रूप में दिमाग को देता है,तीसरा भाव अपने को प्रदर्शित करने का भी है,उसके लिये लगन का केतु अपने छोटे भाई बहिनों के अन्दर नकारात्मकता को भरता है तो सप्तम का राहु उन छोटे भाई बहिनो के अन्दर उनसे पंचम स्थान में बैठ कर अचानक विद्या वाला योग पैदा कर देता है और वे अच्छी विद्या को प्राप्त करने के बाद दिमागदार बन जाते है। लगन का केतु घर से बाहर रहने का बल देता है तो सप्तम का राहु बाहर रहने के लिये वहाँ के रीति रिवाज और खानपान तथा अलावा सम्बन्धों के प्रति अपना बल देता है,जिससे व्यक्ति को बाहर रहने के लिये कोई परेशानी नही हो सके। लगन का केतु अपनी पंचम द्रिष्टिसे सन्तान भाव को देखता है और उसे खाली रखने की कोशिश करता है,लेकिन सप्तम का राहु अपने ग्यारहवें स्थान को एक ऐसा सकारात्मक पुत्र दे देता है जो अन्य सौ में अपना नाम कमाकर चलने वाला हो और पूरे परिवार के अलावा अन्य लोगों के लिये भी अपना बल देने के लिये माना जाये। लगन का केतु धन से पराक्रम से घर से और शिक्षा से दूर करने की कोशिश करता है और जीवन साथी को भी वाचाल या झूठ बोलने की आदत देता है,शादी के बाद जातक का सामाजिक जीवन अस्तव्यस्त हो जाता है,कितनी ही मेहनत की जावे वह बेकार सी साबित होती है,अचानक किसी ना किसी मामले में खर्च होना जरूर पाया जाता है। जातक को जीवन साथी की उंगलिओं पर नाचना जरूर पडता है,कारण अक्समात निर्णय लेने की आदत से वह किसी लायक नही रहता है। जितना बल जीवन साथी के द्वारा दे दिया जाता है,यानी जितनी चाबी भर दी जाती है उतना ही चलने के लिये राजी होना पडता है।

लगन का केतु और अन्य ग्रहों से सम्बन्ध

केतु के द्वारा बनाई गई खाली जगह को मनुष्य आजीवन उसे भरने के लिये प्रयत्नशील रहता है,केतु का हाल गागर में सागर को पैदा करने जैसा होता है,जितना यह असरकारी होता है उतना ही मनुष्य प्रयत्न शील रहने के लिये मजबूर होता है। मैने पहले भी कहा है कि संसार की हर वस्तु और जीव के अन्दर राहु केतु का समावेश है,जैसे लकडी की बांसुरी को ही ले लीजिये,बांसुरी केतु है और उसे बजाने वाला और उसके छेद राहु है,कपडे की बटन केतु है,यह गोचर से जिस भाव में आता है उसी भाव की कारक वस्तुओं में रुकावट पैदा कर देता है,केतु का काम मोक्ष को प्रदान करना होता है,कार्य से केतु को कोई मतलब तब तक नही होता है जब तक कि राहु अपना आदेश नही दे। लगन का केतु अगर शनि से शासित है तो वह वकालत के गुण पैदा कर देता है,शनि केतु ही दर्जी की औकात देते है,लगन का केतु मारकेटिंग करने वाला व्यक्ति बन जाता है,शनि से पत्थर लोहा नौकरी प्रापर्टी आदि का काम करने लगता है,सूर्य से सरकारी नौकर बनकर काम करने लगता है और सरकारी कामों के अन्दर सरकारी आदेशों को प्रेषित करना और सरकारी आदेशों को बनाना,चुनाव आदि लडकर जनता के अन्दर विजयी बनना और फ़्रिर जैसे सरकार अपने कानून और कारणों से अपने कार्य करवाये उन्हे करना। शुक्र के साथ केतु का सामजस्य भी नही बैठ पाता है या तो जातक का दिल अपने को प्रदर्शित करने का होता है,या फ़िर जातक को बताये गये ढंग से कार्य करना होता है,जातक कार्य उसी प्रकार से करता है जैसे कोई कार्य प्री प्रोग्राम किया गया हो। कठपुतली इसका मुख्य उदाहरण है,उसके अंगों को हिलाने वाला कोई और,गाने वाला कोई और भावना को समझाने वाला कोई और होता है। इसी के साथ अगर गुरु केतु को लेलेते है तो गुरु जो सम्बन्धों का कारक होता है यह केतु सम्बन्धों को करवाने का कार्य करता है,जैसे कि शादी विवाह करवाना,किसी प्रकार से जो पहले से निर्देशित कानून है और उन्ही कानूनों के अनुसार ही व्यक्ति को सजा देना या सजा से बरी करने का काम भी गुरु केतु करता है,बहुत ही धार्मिक होने से जातक का ध्यान समाधि की तरफ़ मन चला जाता है और वह अपने को पूर्ण रूप से भगवान या प्रकृति के ऊपर छोड देता है। जैसा प्रकृति उससे करवाती है वह करता रहता है। इक्के के घोडे की तरह भी माना जा सकता है,उसे लगाम नाम के राहु के अनुसार चलना पडता है अपनी मर्जी से कहीं भी नही जा सकता है। खेत में बोने वाले बीज की तरह से माना जा सकता है जब तक उसे बोया नही जायेगा और राहु नाम की प्रकृति की शक्ति नही दी जायेगी वह अपने आप जमेगा नही। पूजा में बजाया जाने वाला शंख माना जा सकता है जब तक उसे बजाया नही जायेगा राहु नामकी फ़ूंक उसके अन्दर नही मारी जायेगी वह आवाज निकालेगा ही नही।

केतु को सबल या दुर्बल केतु की भावना ही करती है

इस का उदाहरण हम आज के बने बैटरी इन्वर्टर से ले सकते है,इसका काम बिजली को इकट्ठा करने के बाद अपने पास रखना होता है,जैसे ही बिजली चली जाती है वह बिजली को अपने पास से सप्लाई करना शुरु कर देता है,कम या अधिक बिजली को देने के लिये बैटरी जो कि एक केतु का ही रूप है,की सीरीज बढाने से वोल्टेज बढाये जा सकते है,और पैरलल लगाने से उसकी शक्ति यानी वाटेज बढाये जा सकते है,कई केतु एक साथ मिलाकर काम में लेने से शक्ति का प्रदर्शन सही रूप से किया जा सकता है। लेकिन तादात से अधिक केतु का सहायक होना भी समय के बाद दुखदायी हो सकता है। जैसे एक ही विषय को पढना और उस विषय से सम्बन्धित विवरण अगर भविष्य में बदल जाता है या नया कोई आविष्कार हो जाता है तो वह बेकार ही साबित होजायेगा,जैसे कि पहले टेलीफ़ोन की मान्यता खूब थी,लेकिन मोबाइल के आते ही उसके बनाने वाले बेचने वाले और चलाने वाले सभी बेकार हो गये। केतु के खराब होने से शरीर के अंगों से पता चल जाता है,जैसे कि हाथ सुन्न हो गया और काम नही कर रहा है इसका मतलब है कि केतु खराब नही हुआ है हाथ को शक्ति देने वाले राहु का खराब होना माना जायेगा,आंख से कम दिखाई देना शुरु हो गया है तो वहाँ भी राहु को देखना पडेगा सीधे से केतु को नही देखेंगे,केतु को तो तभी खराब माना जायेगा जब हाथ या आंख बिलकुल ही खत्म हो गयी हो। जिस प्रकार से गाडी की पेट्रोल खत्म होने से वह सडक पर खडी हो जाती है,उसी प्रकार से लगन का केतु किसी न किसी प्रकार से शरीर के अन्दर से राहु की शक्ति समाप्त होने पर बेकार हो जाता है,शरीर के अन्दर राहु का स्थान अद्रश्य शक्ति के रूप में जाना जाता है और राहु मस्तिष्क में निवास करता है,मस्तिष्क से सोचने समझने की शक्ति का बेकार होना भी केतु को बरबाद करने के लिये मुख्य माना जायेगा। पेन के अन्दर से स्याही के खत्म होने से राहु और केतु के बारे में नही सोचना पडेगा,स्याही के कारक ग्रह को सोचना पडेगा कि उसके अन्य कारक ग्रह भी साथ दे रहे है कि नही।

लगन का केतु और उससे सम्बन्धित रिस्तेदार

केतु का सम्बन्ध शनि से होने पर जो भी रिस्तेदार होते है,वे सब काम धन्धे से सम्बन्ध रखते है यह सम्बन्ध चाहिये ठेकेदार से जुडा हो या फ़िर किसी पार्टी के पास करने से अथवा दुकान में काम करने वाले हेल्पर के रूप में हो,सूर्य से सम्बन्ध होने पर बडे भाई की सन्तान से भी माना जाता है भतीजे के रूप में भी माना जा सकता है अथवा वह पिता के साले यानी मामा से भी माना जा सकता है,अथवा पिता के द्वारा रखे गये नौकर भी माना जाता है। इसके अलावा चन्द्रमा से सम्बन्ध होने से माता खानदान से सम्बन्धित रिस्तेदार माने जाते है,नाना के बारे में भी यह केतु अपना समर्थन व्यक्त करता है। मंगल के साथ होने से चाचा या मामा या खून के रिस्तेदारों से भी माना जाता है बडे भाई या छोटे भाई के साले से भी सम्बन्ध माना जाता है,बुध के साथ होने से भान्जे के रूप में भी माना जाता है,और अगर बुध के साथ राहु तेज है तो वह बहिन के पति के रूप में भी माना जाता है। गुरु के साथ होने से वह किसी धार्मिक व्यक्ति का चेला भी माना जा सकता है अथवा किसी प्रकार से अपाहिज होने की दशा में साथ देने वाला घर या बाहर का व्यक्ति भी माना जाता है,शरीर के अंगों के बारे में अगर गुरु और केतु किसी खराब ग्रह से सम्बन्धित है तो यह किसी प्रकार से सम्बन्धित अंग को बरबाद करने के लिये भी माना जाता है। शुक्र के साथ केतु के होने से यह पत्नी को हेल्पर के रूप में प्रस्तुत करता है अथवा किसी कारण से पत्नी का हेल्पर बनकर ही रहना पडता है। पत्नी का हेल्पर बन कर रहने से वह अपने विचारों और कार्यो को अपने अनुसार व्यक्त नही कर सकता है वह केवल अपनी पत्नी या पति की आज्ञा पर अपने शरीर और मन को गिरवी जैसा रख देता है।

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