ज्योतिष में केतु

केतु

धूम्रा द्विबाहव: सर्वे गदिनो विकृतानना:। ग्रधासनागता नित्यं केतव: स्युर्वरप्रदा:॥

केतु का कोई आधार स्तम्भ नही है,चन्द्रमा के कान्तिवृत का दक्षिणी कटाव बिन्दु ही केतु कहलाता है। अन्ग्रेजी में इसे सदर्न कोड कहते है। पुराणॊं के अनुसार केतु हिरण्यकशिपु की पुत्री सिंहिका का कनिष्ट पुत्र है।

ज्योतिष में केतु

केतु मोक्षकारक ग्रह है,और इसका प्रभाव मंगल ग्रह की तरह है। केतु असंख्य है,इनमे धूमकेतु प्रधान है,इसका रंग धुयें के समान है और यह सूर्य से दस हजार योजन नीचे है,केतु को मानव शरीर में उदर के निचले भाग तथा पैरों मे तलवों में स्थान मिला है,यह उदर को सही रख पाचन क्रिया को सही चलाकर पैरों द्वारा प्राणी को चलने की शक्ति प्रदान करता है। यह साधक को सिद्ध अवस्था प्राप्त करने में तथा उसके मन और बुद्धि की समस्य वृत्तियों को केन्द्रित कर उसके मनोबल को ऊर्ध्व गति प्रदान कर परमात्मा के चरणों का दिव्य रस पान करवाने में सहायक होता है। यह उच्च का हो और इसकी महादशा हो तो परमात्मा में मन लगता है,आध्यात्मिक लोगों को मोक्ष दिलाने में यह बहुत ही सहायता करवाता है। केतु के नक्षत्रों में अश्विनी मघा और मूल है।

जन्म पत्री में केतु

जन्म पत्री के विभिन्न भावों में केतु अपने अनुसार फ़लकारक बनता है,पहले भाव में यह मन को अशांत रखता है,दिमाग में चंचलता देता है,भाइयों को कष्ट देता है,शरीर में वायु का प्रकोप देता है,दूसरे भाव में पिता के धन को कठिनाई से दिलवाता है,भौतिक साधनों की तरफ़ से मन को हटाता है अथवा पास में होने वाले भौतिक साधनों को बरबाद करता है। तीसरे भाव में भी मन में चंचलता देता है,लोगों के साथ चलने का मानस देता है सदा दूसरों की सहायता करने के लिये आगे करता है,भूत प्रेत आदि में आशक्ति देता है,चौथे भाव का केतु माता पिता के सुख से दूर करता है,उत्साह में कमी देता है,दिमाग में नकारात्मक प्रभाव देता है,किसी भी बात में संतुष्टि नही देता है। पंचम भाव में पराक्रमी बनाता है,अल्प संतति देता है महिलाओं की कुण्डली में संतान को आपरेशन आदि से पैदा करता है,कम संतान देता है,भाइयों से कष्ट देता है। छठे भाव में सुखी बनाता है,कर्जा दुश्मनी और बीमारी में कमी देता है,अक्सर पेट की बीमारियों के अलावा और कोई अधिक बीमारियां नही होती है,बुढापे में जोडों के दर्द की बीमारी देता है,अन्य ग्रह कमजोर होने पर प्रेत बाधा को पैदा करता है। सप्तम में भी मन को अशांत करता है,बेकार की चिन्ता करने के लिये कोई ना कोई कारण पैदा करता है,जीवन साथी और पुत्रो को पीडा पैदा करने में अपनी अहम भूमिका अदा करता है,पानी से भय देता है। अष्टम भाव में शरीर के तेज को कम करता है,जीवन साथी से बैर करवाता है,धन की कमी देता है और धन को अक्सर मौत वाले कारणों में व्यय करवाता है। नवम भाव में केतु भाग्यवान बनाता है दूसरों का हित करवाता है,भाई और बन्धुओं की सेवा करवाता है सर्व धर्म की तरफ़ जाने का इशारा करता है,दसवें भाव में भाग्यवान होने के बावजूद भी कष्ट देता है पिता के सुख से दूर करता है,दिमाग में घमंड देता है जीवन साथी को रीढ की हड्डी की बीमारी देता है,ग्यारहवे भाव में धनी बनाता है सुखी रखता है बडे भाई को मिलाकर चलता है सदगुण पैदा करता है बारहवे भाव का केतु उच्च पद पर आसीन करता है तेजस्वी बनाता है बुद्धिमान बनाता है,लेकिन शक या कपट दिमाग में पैदा करता है।

कष्टकारक केतु

जन्म कुंडली में केतु अगर पहले दूसरे तीसरे चौथे पांचवें सातवें आठवें भावों मे है और नीच का भी है अथवा किसी ग्रह के द्वारा पोषित किया जा रहा है तो निश्चित ही आर्थिक मानसिक भौतिक पीडा अपनी महादशा अन्तरदशा में देगा,इसमे कोई शक नही करनी चाहिये,समय से पहले यानी दशा अन्तर्दशा शुरु होने से पहले या गोचर में केतु के इन स्थानों मे आने से पहले ही केतु के बीज मंत्र का जाप कर लेना चाहिये या जाप किसी विद्वान ब्राह्मण से करवा लेना चाहिये।

केतु के रोग

चर्मरोग मानसिक रोग आंत के रोग अतिसार दुर्घटना देना शल्य क्रिया करवाना कुंडली के छठे भाव आठवें भाव और बारहवे भाव के ग्रहों के अनुसार अपनी शिफ़्त बना लेना इसका काम है,अधिकतर मामलों में भूत प्रेत और हवा वाली बीमारियां केतु के द्वारा मानी जाती है। अगर किसी रोग में दवाइयों आदि से भी रोग ठीक नही हो तो समझना चाहिये कि केतु किसी न किसी प्रकार से दशा अन्तर्दशा से या गोचर से परेशान कर रहा है,इसलिये केतु के जाप दान पुण्य आदि करने चाहिये। अपनी व्यथा दूसरों के सामने कहने से केतु और अधिक कष्टकारी हो जाता है।

केतु के रत्न और उपरत्न

केतु का रत्न वैदूर्य मणि यानी लहसुनिया जिसे अंग्रेजी में केट्स आई कहते है,गोदन्ती या संगी सवा पांच रत्ती वजन के बराबर मंगलवार या अमावस्या को अश्विनी नक्षत्र धारण करना चाहिये,इससे मुशीबत में चालीस प्रतिशत तक आराम मिल जाता है।

केतु की जडी बूटी

असगंध की जड मंगलवार को अश्विनी नक्षत्र में काले रंग के धागे में पुरुष और स्त्री दोनो ही दाहिने हाथ की भुजा में धारण करे,केतु चूंकि छाया ग्रह है और इसकी शिफ़्त के अनुसार कोई लिंग नही है। कुछ सीमा तक इस ग्रह का प्रभाव असगंध को धारण करने के बाद कम होना शुरु हो जायेगा।

केतु के लिये दान

अश्विनी मघा और मूल नक्षत्रों में कस्तूरी तिल छाग काला कपडा ध्वजा सप्तधान उडद कम्बल स्वर्ण आदि ब्राह्मण को श्रद्धा पूर्वक दान करना चाहिये।

केतु के व्यापार

तांबे का व्यापार केतु के अन्दर आता है टेलीफ़ोन कोरियर ठेकेदारी खेती सम्बन्धी काम दवाइयों का व्यापार नेटवर्किंग का काम मोबाइल टावर से जुडे काम केतु के व्यापार में आते है,सूर्य और गुरु के साथ होने पर लकडी के लट्ठों का काम,शनि के साथ होने सीमेंट के खम्भों का काम भी फ़ायदा देने वाला होता है,लोहे के खम्भे बनाने सरिया राड पाइप आदि के काम भी केतु के अन्तर्गत आते है।

केतु की नौकरी

अलग अलग ग्रह के अनुसार केतु अपनी नौकरी करवाने के लिये माना जाता है,राशियों और ग्रहों के प्रभाव के कारण केतु अपना आस्तित्व बनाता है,जैसे गुरु के साथ केतु होने पर वह मन्दिर का पुजारी बना देता है लेकिन गुरु का सूर्य के साथ होने पर नेता बना देता है,और मंगल का असर होने पर वह राज्य के अफ़सर की कुर्सी पर बैठा देता है,शनि का साथ होने पर चपरासी बना देता है,शनि शुक्र का साथ होने पर कुली और रिक्सा चलाने वाला बना देता है,मिथुन राशि का केतु या तो डाकिया बना देता है या कोरियर की डाक बांटने वाला हरकारा बना देता है,राहु को मंगल का बल मिलने पर वह केतु को इन्फ़ोर्मेशन तकनीक का उस्ताद बना देता है आदि बाते केतु के बारे में जानी जाती है।

केतु के मंत्र

केतु की शांति के लिये और केतु के बुरे प्रभावों से बचने के लिये शास्त्रों में केतु की पूजा का विवरण दिया गया है। नित्य एक सौ आठ पाठ करने से केतु के फ़लों में चमत्कारिक फ़ल मिलते देखे गये है। अगर जातक खुद न कर सके तो अपने नाम पिता के नाम गोत्र आदि से संकल्प करने के बाद किसी योग्य विद्वान व्यक्ति से यह पाठ करवा सकता है।

विनियोग

केतुं कृण्वन्निति मंत्रस्य मधुच्छन्द ऋषि: गायत्री छंद: केतुर्देवता केतुप्रीत्यर्थे जपे विनियोग:।

अथ देहांगन्यास

केतुं शिरसि। कृण्वन ललाटे। अकेतवे मुखे। पेशो ह्रदये। मर्या नाभौ। अपेशसे कट्याम। सं ऊर्व्वो: । उषद्भि: जान्वो:। अजायथा: पादयो:।

अथ करन्यास

केतुं कृण्वन अंगुष्ठाब्यां नम:। अकेतवे तर्जनीभ्याम नम:। पेशोमर्या मध्यमाभ्याम नम:। अपेशसे अनामिकाभ्याम नम:। समुषद्भि: कनिष्ठकाभ्याम नम:। अजायथा: करतलपृष्ठाभ्याम नम:।

अथ ह्रदयादिन्यास

केतुण्कृवन ह्रदयाय नम:। अकेतवे शिरसे स्वाहा। पेशोमर्या शिखायै वषट। अपेशसे कवचाय हुँ। समुषद्भि: नेत्रत्राय वौषट। अजायथा: अस्त्राय फ़ट।

अथ ध्यानम

धूम्रो द्विभाहुर्वरदो गदाधरो गृध्रासनस्थो विकृताननश्च। किरीटेयूरविभूषितो य: सदाऽस्तु मे केतुगण: प्रशान्त:॥

केतुगायत्री

अत्रवाय विद्महे कपोतवाहनाय धीमहि तन्न: केतु: प्रचोदयात।

केतु का बीज मंत्र

ऊँ स्त्रां स्त्रीं स्त्रौं स: भूभुर्व: स्व: ऊँ केतुंग कृण्वन्नकेतवे पेशो मर्य्याऽअपेशसे। समुष्द्भिरजायथा। ऊँ स्व: भुव: भू: ऊँ स: स्त्रौं स्त्रीं स्त्रां ऊँ केतवे नम:।

केतु के लिये जाप मंत्र

ऊँ स्त्रां स्त्रीं स्त्रौं स: केतवे नम:। 17000 प्रतिदिन।

केतु पंचविंशति नाम स्तोत्रम

केतु: काल: कलयिता धूम्र केतु: विवर्णक:। लोक केतु: महाकेतु: सर्व केतु: भयप्रद:॥
रौद्र: रुद्रप्रिय: रुद्र: क्रूर कर्मा सुगन्ध धृक। पलाश धूम संकाश: चित्र यज्ञोपवीत धृक॥
तारागण विमर्दी च जैमिनेय: महाधिप:। पंचविशंति नामानि केतो: य: सततं पठेत॥
तस्य नश्यति बाधा च सर्व केतु प्रसादत:। दन धान्य पशूनां च भवेत वृद्धि: न संशय:॥

केतु मंगल स्तोत्र

केतु: जैमिनि गोत्रज: कुश समिद वायव्य कोणे स्थित:। चित्रांग: ध्वज लांछनो हिम गुहो यो दक्षिणा शा मुख:॥
ब्रह्मा चैव सचित्र चित्र सहित: प्रत्याधि देव: सदा। । षट त्रिंस्थ: शुभ कृच्च बर्बर पति: सदा मंगलम॥

केतु क्यों परेशान करता है ?

केतु का बार बार कष्ट देना और प्राणी को आगे बढने से रोकना आदि केतु के कारण ही माना जाता है,जीव के साथ दुर्घटना को देने वाला कारक केतु है,शल्य क्रिया और भूत प्रेत की बाधा देना भी केतु के हाथ में ही होता है,लेकिन प्रश्न यन पैदा होता है कि केतु परेशान क्यों करता है। एक कहावत है कि "क्षीणे पुण्येमर्त्यलोकेविशन्ति" के अनुसार जीव के पुण्य जब क्षीण हो जाते है तो उसे वापस मृत्यु लोक में आकर उन पुण्य को फ़िर से इकट्ठा करना पडता है,और जैसे ही पुण्य एकत्रित हो जाते है,प्राणी फ़िर से मृत्यु लोक से पलायन कर जाता है। लेकिन किये जाने वाले कर्मों के अन्दर भेद और दोष होने के कारण प्राणी को उनके अनुसार सजा भुगतनी पडती है। केतु का काम मोक्ष को देना है,वह गोचर से जिस भाव से गुजरता है उस भाव की कारक वस्तुओ और प्राणियों से मोक्ष देता चला जाता है,अगर कर्म अच्छे है तो अच्छा मोक्ष मिलता है और कर्म खराब है तो खराब मोक्ष मिलता है। जीवन में प्राणी अगर सदमार्ग पर चलता है दूसरे के हित की बात को ध्यान में रखकर कोई भी काम करता है तो उसे कोई तकलीफ़ अन्त में नही होती है,और प्राणी अपनी स्वार्थ पूर्ति के लिये लोगों को कष्ट देता है और यह ध्यान नही रखता है कि उसके द्वारा किये जाने वाले कामो से कई लोगों को तकलीफ़ हो सकती है,कई लोग उसके काम के द्वारा आहत हो सकते है तो केतु उसे कई तरह से प्रताणित करता है,जैसे मंगल केतु मिलकर किसी ऐसी बीमारी को पैदा कर देते है जिसके द्वारा खून के अन्दर इन्फ़ेक्सन हो जाता है,और बीमारी के कीटाणु कीडे बनकर खून के अन्दर फ़ैल जाते है कभी केंसर और कभी टीबी और एड्स की बीमारी से जातक को घोर कष्ट देते है,इन कष्टों की सीमा से जब जातक निकल जाता है तो वह ठीक भी हो सकता है और अन्तगति को भी प्राप्त हो जाता है। प्राणी के मोक्ष देने का काम परमात्मा ने केतु को सौंपा है,केतु जिस ग्रह के साथ बैठ जाता है उसी के अनुसार अपने फ़लों को देने लगता है,जैसे त्रिक भाव में शनि मंगल के साथ केतु बैठ कर व्यक्ति को दो मार्गों पर ले जाता है,या तो वह सर्जन बनाकर लोगों के दुख दूर करने का काम करता है,या रक्षा सेवा में भेजकर लोगों की सुरक्षा का काम करता है या व्यक्ति अगर घोर पाप की तरफ़ जाता है तो उसके पिछले कर्मों के अनुसार उसे कसाई का काम मिल जाता है। केतु को मोक्ष का कारक इसलिये और कहा गया है कि वह जीवन के हर काम को रोकने का काम करता है,और उसके द्वारा हर काम को रोका इसलिये जाता है कि प्राणी को पता चले कि उसने पीछे क्या गल्ती की है जिसके कारण उसे आगे बढ पाने में दिक्कत आ रही है,अगर वह अपनी भूल को सुधार लेता है तो आगे बढ जाता है और अगर अपने स्थान पर अटका रहता है तो वहीं का वही टिका रह जाता है,कष्ट भी झेलता है और काम भी पूरा नही हो पाता है। जो लोग संसार के सुखों की तरफ़ अधिक अग्रसर रहते है उन्हे यह केतु एक समय में बोध करवा देता है कि तुमने काफ़ी सांसारिक सुख भोग लिये और अब जाकर परमात्मा की तरफ़ अपना मन लगाओ और उनके चरणों में अपने सिर को रखकर अपने आगे के जीवन के लिये शांति प्राप्त करने की कोशिश करो,अधिकतर देखा होगा कि जो व्यक्ति पूरे जीवन अपने सांसारिक कार्यों की जद्दोजहद के कारण कुछ आत्मशांति का उपाय नही कर पाये है वे अन्त समय में अपने जीवन को निराट अकेले में गुजारना चाहते है,कोई अपने जीवन की शांति के लिये तीर्थ स्थानों में भटकना चालू कर देता है और कोई किसी सन्त महात्मा या अपने धर्म के अनुसार गुरु के सानिध्य मे जाकर अपने को मोक्ष देने की कोशिश करता है। लेकिन केतु का यह भी कारण सामने आता है कि व्यक्ति जब अपने किये जाने वाले कर्मों का उलंघन करता है और जो कार्य उसे करने थे,उन्हे त्याग कर अगर मोक्ष के लिये भागता है तो भी केतु उसे मोक्ष में भी जाने से रोकता है और व्यक्ति अपने समय तथा जीवन की शक्ति को बेकार में क्षीण करता है। महाभारत की कथा में कुन्ती ने भगवान श्रीकृष्ण से यह वर मांगा था कि वे कुन्ती को केवल कष्ट दें,इसका कारण भी यह था कि जब प्राणी के पास कष्ट आता है तो उसके दिमाग में मन में केवल उसके माने जाने वाले भगवान का ही चेहरा सामने आने लगता है और हे भगवान या हे राम आदि वाक्य ही मुंह से निकलते है,कष्टों में ही व्यक्ति ज्योतिष और धर्म की तरफ़ भागता है,सुख भोगने वालों के लिये तो धर्म और ज्योतिष आदि केवल मखौल ही माने जाते है,वे इसे मनोरंजन का साधन समझते है। कुन्ती ने कहा था कि हे केशव मेरे सुखों से मुझे दूर कर दो,मुझे सांसरिक सुख नही चाहिये,मुझे तो केवल वही कारण चाहिये कि प्रतिपल हमे केशव का ही ध्यान आये। केतु जब त्रिक भावों में होता है तो समझना चाहिये कि भगवान ने धरती पर सुख भोगने के लिये नही लोगों की कर्जा दुश्मनी बीमारी अपमान मौत जानजोखिम पाप कर्म आदि से बचाने के लिये इस धरती पर भेजा है,जैसे छठे भाव में केतु जब होता है और ग्रहों के द्वारा शक्ति लेकर काम करता है तो वह मकान गाडियों और घरों के ऊपर झंडे लगवा देता है,मंत्री मुख्यमंत्री प्रधान मंत्री आदि के पद देता है,और शरीर के या संसार के जो भी दोष सामने होते है उन्हे शांत करने की पूरी कोशिश करता है। केतु जब दुर्घटना करवाता है तो सामने देखते हुये भी टक्कर होजाती है,उसका कारण है कि जिसे आहत होना है वह देखने के बाद भी अन्धा हो जाता है,या तो उस क्षणिक समय में उसे लगता है कि वह बहुत ही ज्ञानवान है या उसे लगता है कि वह सामने वाले को सीख दे रहा है।

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