गुरु के आठवें भाव के उपचार

आठवां भाव मौत का घर माना जाता है,मौत भी आठ प्रकार की मानी जाती है,पहली मौत अपमान के रूप से मानी जाती है,दूसरी मौत शरीर के नाश से मानी जाती है,तीसरी मौत निसन्तान रहने या केवल पुत्री के रहने पर मानी जाती है,चौथी मौत घर बार छोड कर गुमनाम जिन्दगी जीने की मानी जाती है,पांचवीं मौत आत्मा के विरुद्ध काम करने की मानी जाती है,छठी मौत सामयिक रूप से घर बार त्यागने के कारण मानी जाती है,सातवीं मौत अपने कार्यों से अपने को बरबाद करने से मानी जाती है,और आठवीं मौत जीवन पर्यन्त शमशानी सेवा से मानी जाती है.इस भाव में गुरु के रहने पर जातक का जीवन दोहरे प्रभाव का माना जाता है,या तो वह दो भाइयों के रूप में पैदा होकर पिता की वंशबेल को दो में ही चलाने के लिये सूचना देने वाला हो,या फ़िर अकेला रहकर जमीन के नीचे से योग्यताऒ को इकट्ठा करता रहता हो,इसके अलावा पराशक्तियों को बस में करने के उपाय करता रहता हो,तंत्र मंत्र और साधना के द्वारा मृत्यु के बाद के जीवन को जानने की योग्यता रखता हो,अन्डर ग्राउण्ड काम करने का आदी हो,सामने न दिख कर भी अपना असर किसी न किसी प्रकार से दूसरों पर दे रहा हो,यह भाव कर्म फ़ल का अधिकारी भी है,जैसे कर्म किये है,वैसी ही मौत मिलती है,कहावत भी है,"अन्त गति सो मति",इस कहावत का कारक भी गुरु ही माना जाता है,मति यानी बुद्धि को देने वाला गुरु ही है,लेकिन मन के द्वारा,और इसका कारक किसी न किसी प्रकार से शुक्र को माना जाता है,बुद्धि का प्रकट होना मन को छलने से ही संभव होता है,मन के अनुसार नही हो पाता है,मन को छलने का काम बुद्धि करती है,मन तो कहता है कि आसमान के तारे तोडना है,मगर बुद्धि मन को छलती है,और कहती है,अरे पागल मन ! आसमान में जाने के लिये और तारे तोडने का साधन तो पास में नही है,तो तारे कैसे तोड पायेगा,चल और किसी बात को सोच,और मन को चुप जाना पडता है,लेकिन बुद्धि काम करती है,वह तारे के बारे में जानने के लिये दूरबीन का निर्माण करती है,तारे पर जाने के लिये स्पेस सैटेलाइट का निर्माण करती है,लेकिन मन को चुप रख कर,उसे शान्त करने के बाद ही सम्भव हो पाता है,आठवां गुरु उस बात को जान लेता है,जिसे जानने के लिये साधारण लोग हमेशा लालियत रहते है,वह चमत्कार करना जानता है,कितनी ही छुपी ताकतें उसके पास विद्यमान रहती है,इस भाव का गुरु जब गलत प्रभाव देता है,तो साधारण इन्शान के बस की बात नही होती कि उसे सम्भाल ले,वह फ़टे हाल योगी बन जाता है,उसे पहिनने के लिये कपडों की नही राख लपेटने की आदत होती है,वह किसी प्रकार से साफ़ और स्वच्छ अन्न की चाहत नही रखता वह जो भी मिले खा जाता है,हवा के साथ राख का पीना उसकी आदत बन जाती है,वह मादक पदार्थों को झेलने की शक्ति स्थापित कर लेता है,चिलम गांजा और बीडी उसके उसके मुंह से नही छूटती,शंखिया और अफ़ीम उसे आराम देते है,वह अघोरी बन जाता है,जब गुरु के प्रभाव दिखाई देने लगें तो शुक्र उसकी सहायता कर सकता है,उसके निवास को फ़ौरन बदल देना चाहिये,उसे सजावटी कपडे पहिनाकर दूसरों के सामने रखना चाहिये,धर्म स्थानों शुक्र को बढाने वाले उपाय करने के लिये कपूर की आरती और घी का दीपक जलाना चाहिये,आलू की सब्जी और पूडी लोगों को उसके द्वारा खिलवायी जानी चाहिये,इस प्रकार के प्रयोजन करने से जातक का दिमाग शुक्र की तरफ़ आयेगा,और वह अधिक से अधिक लोगों को भोजन करवाने और अपने नाम को ऊंचा करने के चक्कर में अपनी औकात को भूलता जायेगा,उसे परफ़्यूम और सजावटी सामान से युक्त रखना चाहिये,इस प्रकार से जातक का मन शमशान से हट कर भौतिक दुनिया में आने का करेगा,और जो गुरु शमशान में जाकर अघोरी वृत्ति को अपनाना चाहता था,वह दुनियादारी से जुड जायेगा.

नवें भाव के गुरु के उपचार

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