सातवें भाव के गुरु के उपचार

कुन्डली का सातंवा भाव घर की गृहस्थी का कारक माना जाता है,वैवाहिक और दाम्पत्य जीवन इस भाव के अन्दर जाने जाते है,यह भाव जीवन को चलाने के लिये प्राप्त होने वाले कामो की जो रोजाना के हिसाब से किये जाते है,का कारक है,जो भी हम लिखते है,और या जो भी हम इस संसार के अन्दर से खोजते है,चाहे वह खोज मनुष्यों के बीच की हो या फ़िर जमीन की या फ़िर जमीन और आसमान की खोज हो,उस खोज से जो भी हम प्राप्त करते है,वही रोजाना के कामों के अन्दर आती है,सुबह जग कर जो भी हमने पांचवें भाव से सीखा है,वह भौतिक रूप से छठे भाव में आजाता है,और जो भी हम छठे भाव की भौतिक सामग्री से उठा पटक करते है,वह हमे भौतिक रूप से सातवें भाव से प्राप्त होता है,जो हमने छठे भाव में किया है,उसका नगद परिणाम सातवें के अन्दर हमे मिल जाता है,अगर छठे का काम सही रूप से किया है,तो सातवें का परिणाम अच्छा होगा,अगर हमने छ्ठे के प्रति आलस किया है,या किसी काम को नजर अंदाज किया है,तो परिणाम भी खराब मिलेगा,सातवां भाव लगभग पूरी तरह से छठे पर निर्भर रहता है,और छठा पूरी तरह से पांचवे पर और पांचवा चौथे पर और चौथा तीसरे पर तीसरा दूसरे पर और दूसरा पहले भाव पर निर्भर रहता है,लेकिन सातवें भाव के लिये जो सीढी है,वह छठे पर अपना दारोमदार पूरी तरह से रखती है,अगर छठे भाव में गुरु को बल देने वाला कोई ग्रह है,तो गुरु आगे के लिये अपना काम करता जाता है,और अगर छठा भाव खाली है,तो गृहस्थी का बुध की स्थिति पर निर्भर करता है,सातवें भाव का स्वामी लालकिताब के अनुसार शुक्र है,और कारक बुध तथा शुक्र दोनो ही माने जाते है,इस भाव में शनि उच्च का होता है,और सूर्य नीच का माना जाता है,सातवें भाव की अगली सीढी आठवां भाव माना जाता है,अगर सातवां सही तरीके से काम कर रहा है,तो आठवां अपना प्रभाव भी अच्छा देता है,पत्नी अगर अपनी जिम्मेदारी निभा रही है,तो जातक को अपमान मृत्यु और जानजोखिम के कामो से बचाव रहेगा,और पत्नी अगर किसी प्रकार से गलत चल रही है,तो जातक को सातवें का मिलने वाला भौतिक परिणाम दुखदायी ही होगा,चौथा भाव हर भाव का सुख भाव माना जाता है,सातवां भाव माता मन और मकान के प्रति अच्छे या बुरे परिणाम का कारक माना जाता है,पति की चालचलन वाली स्थिति अगर सही है,तो घर में शाति रहेगी,पत्नी अगर अपने रोजाना के कार्यो को मन लगाकर और बुद्धिमानी से करती है,तो घर में शांति रहेगी,गुरु जो कि जीव का कारक है,वह सातवें भाव में आकर पूरी तरह से पति या पत्नी के ऊपर निर्भर हो जाता है,जातक या जातिका के दो भाई मिलते है,मगर शर्त है कि मंगल का ग्यारहवें घर में अगर निवास है तो,अन्यथा एक भाई के लिये जोखिम भी मानी जा सकती है,सातवां भाव कुन्डली के केन्द्र का भाव माना जाता है,और जो भी होता है,वह अस्थाई नही होता है,हमेशा के लिये माना जाता है,भले ही शादी करने के बाद जीवन साथी से तलाक ले लिया जावे,मगर एक स्थाई छाप हमेशा के लिये दिल और दिमाग में बन जाना स्वाभाविक है,जो स्थिति पहले किये गये वरण की होती है,वह आगे कितने ही कर लिये जावें नही रहती है,सातवें भाव के गुरु पर अगर किसी प्रकार से सूर्य और चन्द्र तथा राहु गलत परिणाम दे रहे है,तो उनका परिणाम गलत ही निकलता है,उपाय के रूप में कोई भी धारणा काम नही करती है,सूर्य गुरु को नकारात्मक सोच देता है,और हमेशा नीचे से ऊपर के लिये सोचता है,माता के अन्दर अहम की मात्रा भर जाने से जीवन साथी के लिये तनाव और उत्तेजना का होना शर्तिया माना जाता है,इसी प्रकार से अगर किसी प्रकार से राहु का असर सातवें भाव के गुरु के प्रति जा रहा है,तो जीवन साथी के अन्दर कामुकता का प्रभाव अधिक आजाता है,और उस कामुकता का प्रभाव तभी आता है,जब किसी प्रकार से यौन अंगों में किसी प्रकार का संक्रमण होता है,अथवा राहु वाली वस्तुओं का उपयोग किया जाता है,जैसे उत्तेजक परफ़्यूम,शराब,या किसी प्रकार की जैली,या फ़िर मुर्गा या बकरे का मांस या फ़िर सूअर का कच्चा गोस्त प्रयोग किया जाता है,तो संक्रमण की संभावना और अधिक बढ जाती है,इन संक्रमणों से बचने के लिये लाल-दवा का प्रयोग नहाने के पानी में करना चाहिये,इस का एक और प्रभाव अधिक रूप से देखा गया है,कि यौन अंगों के आसपास गांठों की शक्ल की छोटी छोटी फ़ुन्सियां हो जाती है,जिन्हे आयुर्वेद में बद के नाम से जानते है,यह गांठें खुजली पैदा करती है,और अधिक खुजलाने पर उनके अन्दर से मवाद जैसा पानी निकलता है,जहां जहां वह पानी लगता है,और अधिक बदें फ़ैलनी चालू हो जाती है,इनको रोकने के लिये सफ़ेद मूसली की जडों के साथ फ़िटकरी,सादा नमक और सौंठ को पीस कर नीबू के रस के साथ लेप करने से यह बदें झड जाती है,इस भाव में शनि और गुरु का साथ होने पर जीवन साथी का स्वभाव धर्मी बन जाता है,वह किसी भी बात को सही रूप से प्रकट नही कर पाता है,उसके द्वारा किसी को किसी बात के लिये मना करना नही आता है,वह अगर किसी को धन देदेता है,और जब वह दिये गये धन को मांगने जाता है,और जिसे धन दिया गया है,वह और परेशानी में दिखाई देता है,तो वह और धन देकर चला आता है.शनि और गुरु मिलकर बुध की सिफ़्त के बन जाते है,और केतु का असर भी इन सबके जैसा घूमने वाला बन जाता है,जीवन साथी का स्वभाव चिल्लाकर बात करने का बन जाता है,कारण केतु के कारण जातक के जीवन साथी के अन्दर कान की बीमारियां या दिमाग का लगातार चलते रहने के कारण सुनी या कही जाने वाली बात का असर नही होता है,जिस प्रकार से चलते हुये वाहन के अन्दर से वाहन की आवाज के साथ बोली जाने वाली आवाज का मिल जाने के कारण चिल्ला कर बोलना होता है,उसी प्रकार से जब जातक का दिमाग किसी न किसी बात में चलता रहता है,तो उसके जीवन साथी की धीमी आवाज का असर उसके कान में नही जाता है,अगर जाता भी है,तो अनसुनी कर देता है.इस भाव के गुरु का एक प्रभाव और भी देखा गया है,कि गुरु पर अगर कोई स्त्री ग्रह असर दे रहा है,तो जातक के जीवन साथी पर स्त्री जातक असर देते है,और अगर किसी प्रकार से पुरुष् ग्रह असर दे रहा होता है,तो जातक के जीवन पर पुरुष जातक असर दे रहे होते है.अगर चन्द्रमा का प्रभाव गुरु पर है तो माता का असर पिता पर चला जाता है.इस गुरु के मिलने वाले कुप्रभाव से बचने का एक बहुत ही अच्छा तरीका है,कि घर के अन्दर किसी भौतिक मूर्ति को न रखा जावे,चाहे वह किसी देवता की मूर्ति हो या फ़िर किसी प्रकार की सजावटी मूर्ति,तस्वीरों को रखा जा सकता है,तुलसी की माला का रखा जाना भी दुष्प्रभाव देने वाला होता है,जो भी स्वर्णाभूषण होते है,उनको पीले कपडे में बांध कर रखने से उन पर पडने वाला प्रभाव कम हो जाता है,पीले कपडे पहिनने वाले साधु सन्यासी जातिका या जातक पर अपनी छाप छोड देते है,और परिणाम में वे चरित्र या धन के सम्बन्ध में किसी न किसी प्रकार नुकसान पहुंचाते है.

आठवें भाव के गुरु के उपचार

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