छठे भाव के गुरु के उपचार

छठा भाव भी बुध का घर माना जाता है,इस भाव का गुरु अगर कोई भी गलत प्रभाव देता है,तो उस प्रभाव को पकडना आसान नही होता है,इस भाव के गुरु के कारण मान लीजिये कोई बीमारी होती है,तो उस बीमारी को पकडना किसी भी डाक्टर के बस की बात नही होती है,जितने भी डाक्टरों को दिखाया जायेगा,उतने ही प्रकार की अलग अलग रिपोर्ट बनाकर डाक्टर देते चले जायेंगे,और जब सभी रिपोर्टों को मिलाकर देखा जायेगा तो नतीजा सिफ़र में ही निकलेगा,लालकिताब के अनुसार छठे भाव का ग्रह अपने द्वारा आठवें भाव में विराजमान ग्रह के साथ गुप चुप युति लेकर जो भी फ़ल देता है,वह किसी प्रकार से समझने लायक नही होता है,कर्जा दुश्मनी और बीमारी में उलझ कर जातक किसी भी प्रकार के अपमान मृत्यु और जान जोखिम के काम के अन्दर जा सकता है,उसे अपने जीवन में मिलने वाले कष्टों से छुटकारा चाहिये होता है,वह कर्ज की जोखिम के कारण कोई भी अपमान सहने को तैयार हो जाता है,दुश्मनी से छुटकारा पाने के लिये वह किसी प्रकार से भी अपने को जोखिम के अन्दर डाल सकता है,बीमारी से छुटकारा पाने के लिये वह अपने को मृत्यु तक भी ले जा सकता है,इसी प्रकार से जातक का छ: और दसवें भाव पर इस गुरु का प्रभाव प्रत्यक्ष रूप से दिखाई देने लगता है,कर्जा होने पर उसके पास किये जाने वाले कामों के अन्दर दखलंदाजी आजाती है,और वह जो काम करता है,वह सही तरीके से और समय पर नही हो पाते है,पिता या सरकार से जुडे कामों पर भी प्रभाव पडता है,बाहर से मिलने वाली सहायतायें भी विरोधी जैसा बर्ताव करने लगती है,धर्म स्थानो पर जाने पर बजाय अच्छाई के बुराई ही मिलती है,कारण उस समय गुरु के छठे भाव में जाते ही राहु को असर मिल जाता है,और वह अपनी शरारत करने से बाज नही आता है,वह किसी न किसी प्रकार से दो लोगों को आपस में उलझाकर दूर बैठ कर तमासा देखना चालू कर देता है,और किसी प्रकार से किसी धर्म या भाग्य स्थान पर जाने पर वह या तो कोई दुर्घटना देता है,या फ़िर किसी प्रकार का अपना दवाई या यात्रा में मिलने वाला दुष्प्रभाव झोंक देता है,जातक को कोई बाहरी या ऊपरी सहायता नही मिल पाती है,इस गुरु के कारण अपने ही कुटुम्ब के लोग दुश्मनी जैसा व्यवहार करने लगते है,और किसी प्रकार का पारिवारिक तनाव आते ही खिल्ली उडाने से नही चूकते है,नगद धन और भौतिक साधनों की कमी होने लगती है,जातक को पैसे पैसे के लिये मोहताज होना पडता है,जातक का एक ही धर्म रह जाता है किसी प्रकार से कहीं से भी पैसा मिले,वह जानकार और पहिचानने वालों से कर्जा करने लगता है,किसी बैंक या धन देने वाले लोगों के द्वारा बहुत ही ऊंची ब्याज दर पर धन को लेता है,और नही चुकाने पर अपने बच्चों को दर दर का कर लेता है,इस प्रकार के जातक के साथ अक्सर देखा गया है,कि किसी प्रकार एक व्यक्ति जुड जाता है,जिसका काम ब्याज आदि से लोगों की सम्पत्ति को गिरवी रखा जाता है,और वह घर के अन्दर आकर अपनी दादागीरी या सहानुभूति के नाम पर घर की बहुमूल्य सामानों को ले जाता है,और एक पारिवारिक सदस्य की तरह से घर के अन्दर आकर पडा रहता है,अगर वह पुरुष जातक है,तो पत्नी या घर की स्त्रियों के साथ अनैतिक सम्बन्ध बनाकर परिवार को बरबाद कर देता है,इस गुरु का प्रभाव अगर वह खराब प्रभाव है,तो जातक को फ़ौरन सचेत होकर अपनी गतिविधियों पर फ़ौरन अंकुश लगा देना चाहिये,और गुरु से जुडी वस्तुयें मन्दिरों और धर्म स्थानो पर देनी चालू कर देनी चाहिये,उस समय खुद के सलाह से व्यापार नही करना चाहिये किसी भी प्रकार से अपने बच्चों या साले या मामा की राय लेकर व्यापार करने में राहु अपनी हरकत नही कर पायेगा,इसका कारण केतु जो मामा,भान्जा,पुत्र या साले के रूप में होता है,अनैतिकता घर के अन्दर नही घुसने देगा,इस प्रकार के गुरु के प्रभाव के आते ही जातक आमिष भोजन की तरफ़ भी जाना चालू कर देता है,उसे अपने को सात्विक भोजन की तरफ़ अपना ध्यान ले जाना चाहिये,और आसपास जो भी मुर्गी या बतख पालने वाले है,उनको दाना डालना चाहिये,किसी खुली जगह में कबूतरों को भोजन देना भी ठीक रहता है,धर्म स्थान के पुजारी की कपडे आदि से सहायता करनी चाहिये,पीलिया आदि रोग होने पर शुक्र की वस्तुओं का सेवन करना चाहिये,जैसे दही,और चौथे घर मे मंगल को स्थापित करने के लिये गन्ने का रस भी प्रयोग किया जाता है,मंगल का भोजन मीठा माना जाता है,पहले घर में मंगल गन्ना होता है,चौथे घर में जाकर वह तरल रस का रूप ले लेता है,और आठवें भाव जाकर वही रस गुड का रूप बन जाता है.नवें भाव मे वह मिठाई के रूप में मिलने वाला प्रसाद बन जाता है,बारहवें भाव में वह बतासा के रूप में हवा वाली मिठाई बन जाता है.

सातवें भाव के गुरु के उपचार

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