गुरु के बारहवें भाव के उपचार

बारहवां भाव यात्रा और खर्च से माना जाता है,जिन्दगी की आखिरी मंजिल का वृतांत इसी भाव से मिलता है,वह चाहे दिन के समाप्ति के बाद का हो,या जीवन के समाप्त होने के बाद हो,यह भाव आराम करने का होता है,काल चक्र के अनुसार इस भाव का प्रभाव होने से जातक का दिमाग और शरीर लगातार चलता रहता है,इस भाव से सूक्ष्म शरीर की जानकारी प्राप्त की जाती है,सूक्ष्म शरीर जीव के नाम से जाना जाता है,और यह जीव जब यात्रा पर होता है,तो चाहे वह सोने के बाद स्वप्न में की जाने वाली यात्रा हो,या फ़िर शरीर के चेतन अवस्था की भौतिक यात्रा हो,इस भाव से खर्च का ब्यौरा जाना जाता है,जीवन में आकर क्या खर्च किया है,और कितना खर्च किया है,सांस को शरीर के अन्दर खींचने के बाद जो सांस छोडी जाती है,वह सांस शरीर में प्रवेश करने के बाद शरीर के ग्यारह भावों में घूमने के बाद ही बारहवें भाव में आकर अपना अच्छा या बुरा परिणाम देकर बाहर जाकर जो भी शरीर के अन्दर की गति विधियां होती है,चाहे वे मानसिक हो,वाचिक हों या फ़िर कर्म से हों सभी की इन्ट्री पाराडिस्क में जाकर कर देती है,यही कम्प्यूटर की हार्ड डिस्क की तरह से सभी इन्ट्रियों को संभालने के बाद जो भी आगे का जीवन होता है,उसी प्रकार का परिणाम अगली सांस को खींचने के बाद मिलता है,जिस तरह से कम्प्यूटर का प्रोग्राम बनाते वक्त कितनी ही बाइट को प्रयोग किया जाता है,लेकिन जब सभी बाइट्स इकट्ठी हो जाती है,तो एक प्रोग्राम बन जाता है,और वह प्रोग्राम चलाने के बाद पता चलता है,कि अच्छा बना या बुरा,इसी तरह से हर सांस का परिणाम जीवन के शुरुआत के अन्दर अपना प्रभाव बताना चालू कर देता है,अगर अच्छा सोचा है,और अच्छा बोला है,अच्छा किया है,तो अगला क्षण जो आने वाला है,वह अच्छा परिणाम ही देकर जायेगा.इस गुरु का प्रभाव दूसरे भाव पर जाने के कारण जातक के द्वारा बोलने और भोजन करने वाली क्रिया पर अपना प्रभाव देता है,अगर गुरु किसी प्रकार से गंदा नही है,किसी खराब ग्रह की युति या असर नही है,तो जातक का भोजन और बोली आध्यात्मिक हो जाती है,उसका चेहरा पीले रंग का और तेजस्वी बन जाता है,उसका ह्रदय जो चौथे भाव से अपना सम्बन्ध रखता है,साफ़ और दूसरों का हित सोचने वाला होता है,साथ ही जातक को इसे गुरु के आठवें घर पर नजर होने के कारण अपने शरीर को चेतना हीन करने की आदत होती है,कारण आठवां भाव मृत्यु का होता है,और ध्यान समाधि लगाने के बाद जातक का शरीर कुछ समय के लिये मृत जैसा हो जाता है,चेतन मन भौतिकता को त्याग कर आसमानी ताकतों के साथ विचरण करना चालू कर देता है,जातक को कभी भे दुख या सुख की अनुभूति नही होती है,वह समान्तर रूप से दुख और सुख को देखता है,जातक को छुपी हुयी ताकतों के बारे में ध्यान समाधि में जाने के कारण पता चलता है,और वह किसी के बारे मे अपने अन्तर्मन के द्वारा बता सकता है कि अगले क्षण दूसरे के प्रति क्या हो सकता है,मंगल के साथ होने पर वह अपने को अधिक बुद्धिमान समझने लगता है,और ज्ञान को प्राप्त नही कर पाता है,अपने को होशियार समझने के कारण वह ध्यान समाधि की तरफ़ कम और अपने बारे में डींग हांकने मे अधिक बल देता है,शनि का साथ होने पर वह बोलता भी कम है और अकेले में अन्धेरे स्थान में अपना स्थान बनाने तथा गुफ़ा कन्दरा आदि में रहना पसंद करता है,शुक्र के साथ होने पर या तो वह दिमागी रूप से हवा में विचरण करता है,या फ़िर हवाई यात्राओं की तरफ़ अधिक रुझान होता है,मोटापा अधिक होने से वात वाली बीमारियां हो जाती है,बुध के साथ होने पर उसका दिमाग कभी घूम सकता है,और साल भर का किया काम एक ही क्षण में समाप्त कर सकता है,चन्द्र के साथ होने पर वह दूसरे लोगों को आश्रय देता है,और जीवन भर दूसरे लोगों के काम आने के कारण अपने को नही समझ पाता है,अपने जन्म स्थान की जनता से कम और बाहर की जनता से अधिक लगाव रखता है,सूर्य के साथ रहने पर जातक का जीवन जीवात्मा के संयोग से आजीवन आत्माओं से अपना वास्ता रखता है,आदि बातें जानी जाती है,इस भाव के गुरु के होने पर और राहु का स्थान होने के कारण जातक के अन्दर कभी कभी झूठ बोलने की आदत आ जाती है,वह सामने वाले को समझ नही पाता है,और जो देखा नही है,सुना नही है,और किया नही है,उसके बारे में भी बखान करने लगता है,किसी के प्रति अधिक स्नेह होने के कारण झूठ बोलकर उसे बचाने का प्रयास करने लगता है,लेकिन हकीकत में जिससे वह स्नेह रखता है,उसके द्वारा दोषी होने की कहानी खुलते ही वह खुद तो बदनाम होता ही है,लेकिन गवाही देने या बचाने के चक्कर में इस भाव के गुरु वाला दुश्मनी के चक्कर में घिर जाता है.इसी प्रकार से अपना काम निकालने के चक्कर में इस भाव का गुरु ठगने की कोशिश भी करता है,कारण वह अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिये नही ठगता है,दूसरों के दुखों को दूर करने के लिये वह झूठी कहानी गढ कर सहायता करना चाहता है,यह जातक के लिये आगे के जीवन में हानिकारक हो जाता है,जिसकी सहायता वह करता है,वही आगे चल कर उसकी बदनामी करने लगता है,इस गुरु का प्रभाव अधिक रूप से अच्छा या बुरा पहिचानने की जरूरत उसके अपने पुत्र भान्जे या मामा की स्थिति के अलावा बांया हाथ या बायां पैर खराब या सुन्न होने या उनपर प्रभाव को देख कर समझा जा सकता है,कि जातक ने ठगी की है,या नही,झूठ बोला है या नही,इसलिये जातक को न तो कभी झूठ बोलना चाहिये और न ही कभी ठगी करना चाहिये,गुरु साधु और पीपल की सेवा करने से जातक के अन्दर आध्यात्मिक ताकतों का उदय होना चालू हो जाता है,और ठगी फ़रेबी के कारण,जो कर सकता है,केवल उसके लिये ही और अपने जीवन को संतुलित बनाने के कामो के बारे उसे ज्ञान प्राप्त होना चालू हो जाता है.

गुरु के लिये हमेशा किये जाने वाले उपचार

*गुरुवार का व्रत करना गुरु को बढाने का सर्वोत्तम उपाय है,इस दिन व्रत करने के बाद बृहस्पति-भगवान की पूजा पाठ और केले के पेड में चने की दाल और गुड चढाना चाहिये,इस प्रकार का व्रत करने से महिला जातकॊ को मनवांछित वर प्राप्त करने और पुत्र के प्राप्त करने में गुरु कृत दोषों का अन्त हो जाता है,केवल एक बार ही खाना खाया जाता है,और खाने में पीला भोजन बिना नमक के सूर्यास्त से पहले लिया जाता है,पीली रोटी बनाकर उसे घी से चुपड कर खाना चाहिये,भूल कर भी चन्द्र के रूप में दूध और शुक्र के रूप में शर्बत या जूस या दही आदि का प्रयोग नही करना चाहिये,केले भी नही खाने चाहिये.
*हरि यानी विष्णु की पूजा पाठ करना चाहिये,हरिबंश पुराण का पाठ करना चाहिये,और पीपल के पेड को पानी से सींचना चाहिये,पीपल के पेड को पानी देने से कोई पीपल तुम्हारे द्वारा जिन्दा नही रखा जाता है,वह तो प्रकृति ही जिन्दा रखती है,पानी देने के बहाने लगातार पीपल के नीचे जाने से धनात्मक ऊर्जा मिलती रहती है,इसी को धार्मिक भाव में जोडे जाने पर लोगों ने उसे अन्धविश्वास के रूप में मान लिया है,हरिवंश पुराण पढने से कोई मंत्र काम नही करता है,बल्कि मंत्रों को पढने पर जीभ नाक और गले के साथ ह्रदय के स्पन्दन से शरीर को ऊर्जा मिलती है,उसी ऊर्जा के द्वारा मानसिक और शारीरिक विकार दूर होते है.
*गोमेद राहु के लिये पहिना जाता है,राहु को बस में करने वाला गुरु ही होता है,राहु भ्रम है तो गुरु ज्ञान है,ज्ञान के द्वारा सभी भ्रम दूर हो जाते है

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