गुरु के ग्यारहवें भाव के उपचार

ग्यारहवां घर जातक की अचल सम्पत्ति से जुडा है,और इस भाव में गुरु के स्थापित होने से जातक के पास धर्म और वेदादि के साथ धार्मिक ज्ञान का भंडार बढता जाता है,आज के युग में धर्म की महत्ता अधिक नही होने के कारण और वेदादि तथा धर्म के साथ राजनीति होने से गुरु का प्रभाव इस भाव में कमजोर हो जाता है,काल चक्र के अनुसार यह यूरेनस और वैदिक ज्योतिष के हिसाब से यह शनि का पक्का भाव माना जाता है,यूरेनस को संचार का देवता माना जाता है,और शनि को कर्म का देवता माना जाता है,जातक के बडे भाई का रुझान शनि के घर में गुरु के होने से बैंक आदि में चला जाता है,गुरु हवा है,और यूरेनस,जातक की प्रसिद्धि बहुत अधिक मात्रा में हो जाती है,चाहे घर में चूहे उपवास कर रहे हों,ग्यारहवें घर के गुरु का प्रभाव जातक के नाम और शरीर पर जाता है,गुरु अगर जीव है,तो जातक पिता के बाद का सम्पत्ति का रखवाला बनता है,कारण पिता के घर दसवें भाव के बाद जीव की उपस्थिति पुरुष जातक के लिये बडे भाई की उपाधि देती है,जातक के तीसरे भाव में इस गुरु की नजर होने से जातक का पराक्रम बोलने और अपनी गुरु वाली औकात दिखाने में जाती है,सप्तम को देखने के कारण जातक का मुकाबला अधिकतर धार्मिक बातों को लेकर अपने जीवन साथी के साथ होता रहता है,जातक का जीवन साथी अधिकतर गुरु का बल मिलने के कारण जातक के दोस्तों के साथ अपना संबन्ध संचार या व्यक्तिगत कारणो से बनाकर रखता है,जातक का जीवन खुद के लिये भी एक दोस्त की तरह से हो जाता है,किसी भी परिवार और समाज वाले से भावना युक्त प्रीति नही रहती है,ग्यारहवें गुरु का प्रभाव शिक्षा वाले स्थानो और जल्दी से धन कमाने वाले साधनो की तरफ़ जल्दी से चला जाता है,मनोरंजन के साधनो और जल्दी से अफ़ेयर करने के लिये जातक मसहूर हो जाता है,खेल कूद और प्रतिस्पर्धा वाले कामो का उस्ताद माना जाता है,शिक्षा वाले संस्थानों में शिक्षा वाले क्षेत्रों में जीवन साथी के पलने से और बढने से जीवन साथी का प्रभाव शिक्षात्मक ही रहता है,वह हर बात को बताना अधिक चाहता है,और करना कम चाहता है,जीवन साथी के पिता का स्वभाव भी आध्यात्मिकता की तरफ़ रहने से जातक का स्वभाव आध्यात्मिकता से दूर होता चला जाता है,इसका कारण भी मानसिक वृत्तियों का पनपना होता है,जातक का मानस जब प्रणय की तरफ़ होता है,तो उस समय जीवन साथी का मानस अन्य आध्यात्मिक कारणों की तरफ़ होता है,अथवा प्रणय संबन्धों को लेकर जातक को प्रवचन सुनने को मिलते है,और परिणामस्वरूप जातक को धर्म और आध्यात्मिक तथा शिक्षा वाले क्षेत्रों से दिमाग के अन्दर प्रादुर्भाव का जन्म होना चालू हो जाता है.जातक को शनि के घर में गुरु के होने से वात वाली बीमारियों से परेशान होना पडता है,उसके दाहिने या बायें कंधें में वात वाली बीमारियां या सुन्नता अथवा चिलकन वाली तकलीफ़ें,
पेट में गैस या हवा वाली बीमारियां,गर्भाशय में हवा भरने वाली बीमारियां,आदि की तकलीफ़े यह गुरू देता है.इस भाव का गुरु दिमाग में कालापन यानी निगेटिविटी देता है,इससे बचने के लिये उगते हुये सूर्य का दर्शन करना चाहिये,अपने पास रहने या काम करने वाले स्थान पर पीला रंग अधिक प्रयोग करना चाहिये,अपने पिता के पग चिन्हो पर चलने से और पिता वाले कामों को प्राथमिकता देने पर जातक का मान सम्मान बढता चला जाता है,ग्यारहवां गुरु पिता के दूसरे भाव में होता है,दूसरा भाव धन का भाव बोला जाता है,पिता को धन और कुटुम्ब के बारे में अत्याधिक जानकारी होती है,इसलिये पिता का सानिध्य अधिक सहयोगी बन जाता है,जातक को पीपल के पेड के नीचे अपना अधिक से अधिक समय बिताना चाहिये,कारण पीपल के पेडे में धनात्मक इनर्जी होने से जातक का नकारात्मक ध्यान खत्म होता रहता है,लेकिन रात के समय पीपल के पेड के नीचे नही जाना चाहिये,हो सके तो पीपल के पेड को पानी देना चाहिये,और पीपल के पेड को छति नही पहुंचानी चाहिये.

गुरु का बारहवें भाव के उपचार

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