गुरु के दसवें भाव के उपचार

द्सवां गुरु वैदिक ज्योतिष में नीच का बताया जाता है,इस भाव में गुरु के नीच होने का जो मुख्य कारण है उसके प्रति ज्योतिष कुछ भी कहे,लेकिन यह भाव कर्म का भाव है,पिता का भाव है,माता का सप्तम भाव है,बडे भाई या बहिन का बारहवां भाव है,पत्नी या पति का चौथा भाव है,पुत्र का छठा भाव है,सट्टा लाटरी जुआ और घुडदौड का भी छठा भाव है,छोटे भाई बहिन का अष्टम भाव है,धन और भौतिक वस्तुओं का नवां भाव है,लगन का कर्म भाव है,और खर्च और यात्रा का ग्यारहवां भाव है,गुरु ज्ञान का कारक है,गुरु धर्म का कारक है,गुरु शादी विवाह और वैवाहिक जीवन को बनाने का ग्रह है,गुरु सांस है,गुरु ही ईथर है,गुरु के बिना जीव की उत्पत्ति कहां से मानी जा सकती है,गुरु जीव है,सूर्य आत्मा है,सूर्य पिता का कारक है,और गुरु जीव का कारक है,पुरुष की कुन्डली में गुरु को ही लगन के सद्रश माना जाता है,स्त्री की कुन्डली में शुक्र को भी लगन के बराबर उपाधि दी जाती है,छठा भाव कर्जा दुश्मनी और बीमारी के अलावा रोजाना के किये जाने वाले कामों को भी देता है,अगर जीवन में छठे भाव का आस्तित्व न हो तो व्यक्ति को जीवन निकालना भारी पड जायेगा,छठा और बारहवां भाव जीवन में प्रतिरोध देते है,इस बात को इस प्रकार से भली भांति समझा जा सकता है,लगन बिजली का फ़ेस है तो सप्तम न्यूटल है,दोनो को अगर डायरेक्ट मिला दिया जावे तो फ़्यूज उड जायेगा,और दोनो के बीच में किसी रजिस्टेंस को लगाकर मिलाया जाये तो दोनो से फ़ायदा लिया जा सकता है,वह रजिस्टेंस चाहे बल्ब के रूप में हो,या फ़िर पंखे के रूप में हो,बल्ब से रोशनी ली जा सकती है,और पंखे से हवा,उसी तरह से पति और पत्नी का छठा भाव रोजाना के कामों का रजिस्टेंस जीवन में देता है,वह बच्चों के रूप में हो या फ़िर रोजाना के कामों के रूप में,इस भाव का मुख्य त्रिकोण दसवा और नवां भाव धन का भाव और कुटुम्ब का भाव माना जाता है,वैदिक ज्योतिष में दसवें भाव में गुरु को इस लिये नीच का कहा गया है,कि जातक का दिमाग हमेशा के लिये लगातार भौतिकता और परिवार के अनसुलझे कारणों के प्रति लगा रहता है,दसवें गुरु का बखान इसलिये भी बुरा माना है,कि पिता का रुझान आध्यात्मिकता की तरफ़ अधिक रहने से जातक का जीवन भौतिक रूप से कठिनाइयों के अन्दर गुजरता है,पिता का ध्यान अपने छोटे भाई बहिनो की तरफ़ अधिक रहता है,जातक का बारहवां भाव जातक के पिता के छोटे भाई बहिनो का माना जाता है,दसवें गुरु का असर धन भाव और कुटुम्ब भाव पर भी जाता है,इसलिये जातक के नगद धन पर पिता की नजर रहती है,और जातक अपने लिये जो खर्च करना चाहता है,उसमें पारिवारिक और कुटुम्ब के आने से और पिता के द्वारा समर्थन देने से वह जो करना है,वह कर नही पाता है,दसवें गुरु का मुकाबला चौथे भाव से होता है,और जातक का पिता हमेशा जान पहिचान वाली जनता,जातक के घर और माता के प्रति प्रतिद्वंदता से परिपूर्ण होता है,जातक का स्नेह माता से अधिक होने और पिता के द्वारा हमेशा माता की क्रियात्मक शैली पर नजर होने से जो माता को करना होता है,वह कर नही पाती है,माता को अपने धर्म का पालन करना पडता है,और जातक के पिता का तीसरा माता का नवां और जातक का बारहवां भाव होने से जातक का धन माता के धर्म के प्रति तथा पिता के परिवार के प्रति भी खर्च और यात्रा करने के कारणो से जुडा होने से इस स्थान के गुरु को नीच की संज्ञा दे दी गयी है.दसवें गुरु का ध्यान जातक के कर्जा दुश्मनी और बीमारी के साथ रोजाना के कामों के अन्दर जाने से भी जातक के द्वारा किसी भी ब्राह्मण वर्ग को महत्ता नही देने के कारण भी इस भाव के गुरु को नीच का माना जा सकता है.इस भाव के गुरु का असर अगर किसी प्रकार से बिगड रहा हो तो बुध का ख्याल करना जरूरी होता है,जैसे अगर कोई बात की जावे तो साफ़ तरीके से बखान की जावे,गुरु हवा है,और छठे भाव पर तथा चौथे भाव पर नजर होने से जातक के सांस लेने में तकलीफ़ और जुकाम वाली बीमारियां परेशान कर सकती है,उस कारण से जातक को कोई भी बात को स्पष्ट रूप से कहने के लिये अपनी नाक और गले को साफ़ कर लेना चाहिये,अधिकतर पानी वाली बीमारियों से बचने के लिये पानी का प्रयोग साफ़ और फ़िल्टर तरीके से करने पर उन पानी वाली बीमारियों का बचाव हो सकता है,पुराने जमाने में बहते पानी में तांबे को डाला जाता था,एक तांबे का सिक्का कितने ही गैलन पानी को शुद्ध करता था,इसलिये ही पानी में तांबे के सिक्के को डालना बताया जाता है,साथ ही तांबा सूर्य होता है ,गोलाई का आकर बुध का होता है,पुत्री पर अहम का प्रभाव हो जाने से वह अपनी आदतों से खराब हो सकती है,इसलिये पुत्री को माता के सुपुर्द करना बेहतर होगा,कहा भी गया है,कि माता का बिगाडा लडका और बाप के द्वारा बिगाडी लडकी कभी जीवन में सफ़ल नही होपाते है.

ग्यारहवें भाव के गुरु उपचार

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