नवें भाव के गुरु के उपचार

नवें गुरु का प्रभाव भाग्य के प्रति और धर्म के प्रति पडता है,जातक का नवां भाव एक समुद्र की तरह से होता है,जहां से जातक के प्रति भाग्य रूपी समुद्र से सफ़लताओं का मानसूर उठता है,और सीधा जाकर कुन्डली के दूसरे भाव से टकराता है,अगर किसी प्रकार से कोई ग्रह दूसरे भाव में विराजमान है,तो वह मानसून अपनी सफ़लताओं की वर्षा करता है,और कोई ग्रह नही है,तो वह सीधा केवल सफ़लताओं का भरोसा दिलाकर लौट जाता है,नवां भाव कुन्डली का सबसे अधिक प्रभाव वाला भाव कहलाता है,मैने जब भी कोई कुन्डली का बखान करना चाहा है,सीधे रूप से भाग्य को पहले देखा है,अगर भाग्य सही है,तो कैसी भी खराब ग्रह की दशा अपना बुरा प्रभाव तो देगी लेकिन भाग्य रूपी ढाल उसकी रक्षा कर लेगी,और भाग्य भाव का सितारा गर्दिश में है तो एक अच्छा ग्रह भी उसके लिये कुछ नही कर पायेगा,एक सज्जन की कुन्डली को देखा,वे जन्म से ही बेकार है,और दूसरों की रोटियों पर ही पल रहे है,उनका भाग्य का सितारा बुध राहु और सूर्य के साथ लगन में विराजमान है,पूरी जिन्दगी जद्दोजहद में ही बीती है,शादी बचपन में ही हो गयी,भाई बन्धु सभी विरोधी हो गये,माता पिता ने दुत्कार कर भगा दिया,मेहनत मजदूरी करने के बाद किसी तरह से पेट पाला,बस एक ही काम नही किया,वह था बुराई,जब भी किसी के लिये कुछ किया केवल भलाई का ही काम किया,उन्होने आधी पढाई करने के बाद रेलवे की नौकरी के लिये फ़ार्म भरा,और नौकरी के लिये इन्टरव्यू भी हो गया,नियुक्ति पत्र नही मिला था,सो उसका इन्तजार करने लगे,तभी दिमाग में आया कि अपने मिलने वालों से मिल लिया जाये,नौकरी तो पक्की हो ही गयी है,लेकिन भाग्य का सितारा राहु के साथ गर्दिश में था,वे अपने चचेरे भाई के साथ लखनऊ में कुछ दिनो के लिये रुक गये,उनके जाते ही नौकरी का नियुक्ति पत्र उनके घर पर आगया,उनकी पत्नी ने किसी के हाथ वह नियुक्ति पत्र उनके पास लखनऊ भेजा,जब तक वह व्यक्ति लखनऊ पहुंचा,वे सज्जन किसी को बिना बताये नैनीताल चले गये,वह जो नियुक्ति पत्र को लेकर गये थे,अपने साले के पास हैदराबाद चले गये,दो तीन दिन नैनीताल में रहने के बाद जब वे घर वापस आये तो उनकी पत्नी ने कहा कि उनका नियुक्ति पत्र तो अमुक सज्जन के हाथ लखनऊ भेज दिया था,आज की तरह से कोई टेलीफ़ोन या तुरत संचार का साधन नही था,वे सिवाय अगले का इन्तजार करने के और कर भी क्या सकते थे,लगातार एक महिना इन्तजार करने के बाद वे सज्जन लौटे,जब नियुक्ति की तारीख देखी तो पता लगा कि वह तो बीस दिन पहले ही निकल गयी,वे नियुक्ति पत्र को लेकर रेलवे के आफ़िस में गये,वहां सबसे बडे अफ़सर ने कह दिया कि उनके नही आने पर किसी अन्य को नौकरी दे दी गयी है,अगली बार फ़िर से फ़ार्म भर कर आवेदन करो,अपना सा मुंह लेकर वापस आ गये.इस तरह से नवे भाव के स्वामी बुध का राहु के साथ रहने के कारण राहु ने रास्ता रोक दिया और सूर्य के चलते बुध आस्तित्वहीन रह गया,नवें भाव का सीधा असर ग्यारहवें भाव पर जाता है,अगर किसी प्रकार से ग्यारहवें भाव में गुरु के शत्रु चन्द्र या बुध विराजमान है,तो भाग्य का सीधा फ़ल बडे भाई और बडी बहिन पर चला जाता है,और इन्ही लोगों के द्वारा जातक को ठगा भी जाता है,इसके अलावा कई प्रकार की छलिया औरतें और आदमी जातक से काम निकलावा लेती है,और जातक को काम निकलने के बाद केवल बुराई दे दी जाती है,इसी प्रकार से अगर लगन में बुध या चन्द्र की राजगद्दी बनी है,तो भी भाग्येश का लफ़डा समझ मे आजाता है,दोनो के चलते जातक को अपनी ही संतान से दुख उठाने पडते है,तीसरे भाव में नवें गुरु का सीधा असर जाता है,जातक को बोलने और व्यवहार करने में आध्यात्मिक बातों और कामो का ख्याल रहता है,जातक की इन्ही बातों का फ़ायदा उठाकर लोग पागल बनाकर अपना काम निकालते जाते है,और जातक को बुद्धू समझ कर बुराइयां देते जाते है,पंचम भाव में गुरु का असर होने से बुढापे में खुद की ही संतान खुद को ही ज्ञान देने लगती है,और जातक को अथक कष्ट मिलने के कारण वह या तो बैरागी बन जाता है,या फ़िर अन्जानी दिशा में निकल जाता है.नवें गुरु के प्रभाव को बेअसर करने के लिये जातक को किसी पवित्र नदी में स्नान करते रहना चाहिये,पवित्र स्थानो में जाकर अपने को दूसरों की सेवा में लगा लेना चाहिये,हमेशा सच बोलना चाहिये,अपमान को सहने की हिम्मत रखनी चाहिये.

गुरु के दसवें भाव के उपचार

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