अरविन्द कौशिक

अपने खून से जीवन बचाने वाली जीवात्मा

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आपके सामने यह कुन्डली श्री अरविन्द कौशिक की है,जो भगवान श्री कृष्ण की रासलीला नगरी वृन्दावन में जन्मे और और आज जयपुर के अन्दर इमलीवाला फ़ाटक के पास अपने परिवार के साथ निवास कर रहे है,इनकी जन्म तारीख 2nd October 1973 और समय शाम की तीन बजकर तीस मिनट का है,कुन्डली में जो ग्रह स्थिति है,वह इस प्रकार से है,मकर लगन है,और लगनेश शनि केतु के साथ छठे भाव में विराजमान है,लगन में बारहवें भाव और तीसरे भाव के मालिक गुरु विराजमान है,चौथे भाव में मेष राशि में बक्री स्थिति में मंगल विराजमान है,नवें भाव में अपमान और जानजोखिम के मालिक आठवें भाव के मालिक सूर्य विराजमान है,पंचम और दसवें भाव के मालिक शुक्र छठे भाव और नवें भाव के मालिक बुध के साथ विराजमान है,चन्द्रमा जो कि सप्तम का मालिक है,ग्यारहवें भाव का होकर वृश्चिक राशि में विराजमान है,बारहवें भाव में धनु का राहु विराजमान है।
मैने बचपन में श्री गोस्वामी तुलसीदास के रामचरित मानस में एक चौपाई ज्योतिष के संदर्भ में पढी थी,"धर्म से विरति,विरति से ज्ञाना,ज्ञान मोक्षप्रद वेद बखाना",गोस्वामी जी इतने बडे ज्योतिषी हो सकते है,इसका कभी अनुमान किसी प्रकार से किसी भी ग्रंथ के अन्दर किसी ने नही लिखा,अगर लिखा भी होगा तो मैने देखा नही है,नवां भाव धर्म का है,और धर्म करने से विरति यानी कार्य क्षेत्र का बनना निश्चित हो जाता है,और जब कार्य क्षेत्र में कार्य किये जाते है,तो ज्ञान नाम फ़ल प्राप्त होते है,और जब मिलने वाले फ़लों का आनन्द लेकर खर्च किया जाता है,तो शांति नाम "मोक्ष" की प्राप्ति होती है,इस कुन्डली के अन्दर आप आसानी से इन चारों कारकों को ग्रहों के अनुसार देख सकते है,धर्म के अन्दर सूर्य विराजमान है,कन्या राशि का सूर्य है,सो नाना खानदान से सम्बन्ध रखता है,सूर्य को मकर का गुरु जिसे नीच की उपाधि से माना जाता है,अपना पूरा का पूरा बल दे रहा है,यह सूर्य रूपी धर्म अपने द्वारा जातक के पास शुक्र और बुध नाम की विरति यानी कार्यों को दे रहा है,शुक्र तुला का स्वग्रही है,पूरा का पूरा बनिया तबियत का अधिकारी है,और व्यापार से सम्बन्धित वस्तुओं का कारक माना जाता है,व्यापार में भी वह वस्तुयें जो कि प्रसाधन के रूप में प्रयोग की जाती हों,और चौथा मंगल इस शुक्र को अपनी सातवीं पूरी द्रिष्टि से बल भी दे रहा है,तो इस व्यापारिक प्रसाधनों का रूप डाक्टरी कारणों से जुड जाता है,बुध जब शुक्र से युति कर रहा है,तो अरविन्द को डाक्टरी कारणो से जुडे सामान का व्यापार करना पड रहा है,और इस व्यापार को करने के बाद जो अरविन्द को प्राप्त हो रहा है,वह वृश्चिक राशि का चन्द्रमा,इस वृश्चिक राशि के चन्द्रमा का रूप बहुत ही अनौखा माना जाता है,वृश्चिक राशि मृत्यु स्थान के नाम से जानी जाती है,और मृत्यु का स्थान पहले तो शमशान माना जाता था,लेकिन आजकल अस्पताल को भी माना जाता है,यानी जो भी कारक मृत्यु से जुडे हों,जैसे किसी ने अपने लिये बीमा करवाया,और बीमा का उद्देश्य था कि उसकी मृत्यु के बाद उसकी बीमा राशि उसके परिजनों को दी जावे,मृत्यु स्थान से ही मोक्ष का स्थान जुडा हुआ है,जिसके अन्दर बडी बडी कम्पनियों और संस्थाओं के प्रति काम किये जावें,या उनसे जुड कर चला जावे,इनके अन्दर अधिकतर जो स्थान आते है,वे या तो अस्पताल आते है,या फ़िर जेलखाने भी आते है,जीव को चेतना देने वाले स्थान भी माने जाते है,किसी कारण को शोधित करने के लिये काम करने के स्थान भी माने जाते है,जो लोग दूसरों के बारे में खोज करने के बाद परिणाम को देते है,वे इस फ़ील्ड में आते है,बायोमेडिकल क्षेत्र के काम भी माने जाते है,जो लोग मनुष्य के आपरेशन करने के बाद खराब अंग को बाहर निकाल कर या किसी अंग के अन्दर की खराबी को हटाने के काम करते है वे भी इस फ़ील्ड में आते है,दवाइयों का काम करने वाले केमिस्टों का भी स्थान इस भाव के लिये माना जाता है,मनोविज्ञान के अन्दर अपना प्रभाव रखकर सामने वाले की स्थिति को समझने की क्रिया भी इसी फ़ील्ड में आती है,और अधिकतर वे काम भी शामिल किये जाते है,जो सामने से कुछ देखे जावें और उनके पीछे कुछ हो रहा हो।
चौथे भाव का मंगल अधिकतर नीच का माना जाता है,लेकिन अरविन्द की कुन्डली में मंगल ने नीच स्थिति को भी उच्च में बक्री होने के कारण बदल दिया है,जो ग्रह किसी प्रकार से नीच का होता है,और वह अगर उस स्थान में बक्री है,तो वह अपनी सिफ़्त को बदल देगा,जैसे अगर नीच का मंगल होता,और राहु बारहवें भाव से अपना असर दे रहा था,तो यह व्यक्ति दूसरों का खून बहाने वाला माना जाता,लेकिन मंगल के बक्री होने के कारण और राहु के द्वारा देखे जाने पर वह प्रभाव उल्टा हो गया,अरविन्द को बजाय खून बहाने के खून दान में देने का प्रभाव शामिल हो गया,जयपुर के सवाई मानसिंह चिकित्सालय में अरविन्द ने इकसठ बार खून देकर दूसरों की जान बचायी है,चाहे ठंड हो या बरसात उसने रात को तीन बजे भी फ़ोन आने पर अपना खून दान में दिया है,चौथे मंगल ने अपने बक्री स्वभाव को बजाय खून लेने के खून देने में अपनी सिफ़्त का बखान किया।
शनि केतु को दर्जी की उपाधि प्रदान की गयी है,दर्जी जो कपडों को काट छांट कर सिलता है,पहले वह पूरे कपडे को काट डालता है,फ़िर धागा की सहायता से उसे जोडकर सिलता चला जाता है,एक कपडे को दूसरे से जोडने के बाद वह एक पहनने का वस्त्र तैयार कर देता है। छोटी सी जगह पर छोटे आदमी के लिये छोटा कपडा प्रयोग किया,बडे आदमी के लिये बडा कपडा सिलकर तैयार किया जाता है,उसी तरह से जब शनि केतु मिथुन राशि के हों,तो वह एक बडे दर्जी की उपाधि का काम करवाते है,एक व्यापारिक संस्थान में काम करने वाला एक दर्जी की भांति ही तो अपना काम करता है,उसकी आफ़िस एक एक दर्जी की टेबिल की तरह से है,वह बाजार में या शहर में अथवा देश के अन्दर या दूसरे देशों में अपने विवेक से ग्राहकों को ढूंड कर उस टेबिल पर लाकर इकट्ठा करता है,और अपने संस्थान के अन्दर जिस प्रकार से दर्जी एक कपडे के अन्दर छोटा बडा सभी प्रकार का कपडा लगाकर पहिनने वाला वस्त्र तैयार करता है,उसी प्रकार से वह सेल्स मेन या मार्केटिंग अफ़सर सभी फ़र्मों को लाकर अपने अपने स्थान पर इकट्ठा करने का काम करता है,और जैसे ही उसकी टार्गेटिंग पूरी हो जाती है,एक संस्थान बन कर तैयार हो जाता है,लोग उसे अपने अपने काम के लिये प्रयोग करते है,अरविन्द के अन्दर भी इसी प्रकार से नौकरी करने के स्थान पर मिथुन का शनि और केतु होने के कारण वह संस्थान के लिये जिसमे भी वह काम करे,एक वस्त्र की तरह से तैयार करता है,और जैसे ही एक संस्थान बनकर तैयार हो जाता है,वह दूसरे संस्थान में काम करना चालू कर देता है,और इसी प्रकार से जिस प्रकार से एक कपडे के बाद दर्जी दूसरे कपडे को बनाकर तैयार करने का काम करता है,वही काम अरविन्द भी करता है। जिस प्रकार से कपडे का रूप बदल जाता है,कभी कुर्ता सिला जाता है,कभी पाजामा सिला जाता है,कभी पेंट सिली जाती है,उसी प्रकार से शनि के अनुसार अरविन्द का काम करने का संस्थान बदलता जाता है।
काम करने के स्थान के बारे में पूरी तरह से अरविन्द की जिन्दगी किन कामों के अन्दर अपना योगदान देगी,ईश्वर ने उसे किन कामों को करने के लिये संसार में भेजा है,किन कामों को करने के बाद अरविन्द को तुरत फ़ायदा होगा,और वह अपने विवेक से किन कामों को करने के बाद अपना नाम करेगा,यह सब अरविन्द के शनि और केतु के साथ शुक्र बुध के बदलने वाले स्थानो के द्वारा ही जाना जा सकता है।सभी बदलने वाले ग्रह जो कि अपने अपने समय के साथ बदल जायेंगे,लेकिन जो ग्रह अपनी ही राशि में है,वे नही बदलेंगे,जैसे मंगल बक्री है,लेकिन कर्क राशि के प्रभाव में मेष राशि के अन्दर है,वह अपना प्रभाव कभी नही बदलेगा,शुक्र दसवें भाव में शनि का प्रभाव लेकर तुला राशि का है,कभी अपना स्वभाव नही बदल सकता है,चौथे भाव में मेष राशि अपना आस्तित्व एक मेढे से बताती है,जो खून से भरी शारीरिक बनावट को रखता है,और जब मंगल बक्री होकर इस राशि में आ गया तो खून भी नकारात्मक ग्रुप का हो गया,तो आप सभी की समझ में आ गया होगा कि मंगल जिसकी कुन्डली में बक्री है,तो वह नकारात्मक ग्रुप का खून होगा,और उसकी पहिचान "ए निगेटिव" बी निगेटिव आदि के द्वारा पहिचानी जायेगी,अरविन्द का खून भी ए निगेटिव है,और जिस प्रकार से मंगल साल दो साल में कभी कभी बक्री होता है,उसी प्रकार से ए-निगेटिव या बी निगेटिव वाले भी कभी कभी ही पैदा होते है,इसीलिये इस प्रकार का ब्लड जरूरत पडने पर आसानी से नही मिलता है,किसी की कुन्डली को देखकर अब आप आसानी से बता सकते है कि मंगल अगर मार्गी है,तो खून पोजिटिव है,और बक्री है तो निगेटिव है,और अस्त है,तो उसे खून की कमी है।
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